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एक पुरानी कहावत है कि यदि किसी व्यक्ति, समाज, संस्कृति, सभ्यता या विचार को समाप्त करना हो, तो हमेशा उसका सीधा विरोध करना जरूरी नहीं होता। प्रत्यक्ष विरोध कई बार उसके भीतर प्रतिरोध की भावना पैदा कर देता है। लोग एकजुट होते हैं, सवाल पूछते हैं और अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए संघर्ष करने लगते हैं। लेकिन यदि किसी समाज की सोच को धीरे-धीरे बदल दिया जाए, उसके विवेक को कमजोर कर दिया जाए और उसकी प्राथमिकताओं को इस तरह बदल दिया जाए कि वह अपने ही हितों के विरुद्ध काम करने लगे, तो स्थिति अलग होती है। तब उसे नष्ट करने के लिए बाहर से किसी बड़े हमले की आवश्यकता नहीं रहती। वह स्वयं अपनी कमजोरियों को मजबूत करता हुआ आगे बढ़ता रहता है।
मानवीय मस्तिष्क भी किसी कंप्यूटर की तरह है। कंप्यूटर में पड़ा एक छोटा-सा वायरस कभी-कभी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर देता है। उसी तरह मनुष्य के विचारों में बैठी एक छोटी-सी गलत धारणा उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकती है। जब व्यक्ति का विवेक कमजोर हो जाता है, तो वह केवल अपने लिए ही समस्या नहीं बनता, बल्कि परिवार, समाज और अंततः पूरे राष्ट्र के लिए समस्या बन सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि किसी व्यक्ति के भीतर यह बदलाव आता कैसे है?
इसका उत्तर उसके जन्म से लेकर उसके पूरे सामाजिक विकास की यात्रा में छिपा हुआ है।
जब भारत के किसी ग्रामीण, निम्न-मध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय परिवार में एक बच्चा जन्म लेता है, तब वह किसी जाति, धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक वर्ग या सामाजिक प्रतिष्ठा की समझ लेकर पैदा नहीं होता। उसके भीतर जानने की उत्सुकता होती है। वह हर चीज को आश्चर्य से देखता है। वह सवाल पूछता है, चीजों को छूकर समझना चाहता है, गिरकर उठता है, खेलता है, कल्पना करता है और अपनी दुनिया स्वयं बनाता है। उसके भीतर संभावनाओं की कोई कमी नहीं होती।
लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके चारों ओर एक अदृश्य घेरा बनना शुरू हो जाता है।
सबसे पहले परिवार उसे बताता है कि उसे कैसा होना चाहिए। फिर समाज बताता है कि उसे क्या करना चाहिए। स्कूल बताता है कि उसे क्या पढ़ना चाहिए। रिश्तेदार बताते हैं कि उसे किस रास्ते पर चलना चाहिए। जाति उसे उसकी सामाजिक पहचान देती है। धर्म उसे कुछ मान्यताएं देता है। आर्थिक स्थिति उसके विकल्प सीमित करती है। रोजगार की चिंता उसके निर्णयों को प्रभावित करती है। राजनीति उसके आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है और प्रशासन उस वातावरण को नियमों और प्रक्रियाओं के माध्यम से नियंत्रित करता है।
धीरे-धीरे एक स्वतंत्र बच्चा सामाजिक अपेक्षाओं से संचालित व्यक्ति बन जाता है।
यहीं से इस चक्रव्यूह की शुरुआत होती है।
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