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चक्रव्यूह (eBook)

समाज शिक्षा और व्यवस्था का जाल।
Type: e-book
Genre: Self-Improvement
Language: Hindi
Price: ₹165
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

एक पुरानी कहावत है कि यदि किसी व्यक्ति, समाज, संस्कृति, सभ्यता या विचार को समाप्त करना हो, तो हमेशा उसका सीधा विरोध करना जरूरी नहीं होता। प्रत्यक्ष विरोध कई बार उसके भीतर प्रतिरोध की भावना पैदा कर देता है। लोग एकजुट होते हैं, सवाल पूछते हैं और अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए संघर्ष करने लगते हैं। लेकिन यदि किसी समाज की सोच को धीरे-धीरे बदल दिया जाए, उसके विवेक को कमजोर कर दिया जाए और उसकी प्राथमिकताओं को इस तरह बदल दिया जाए कि वह अपने ही हितों के विरुद्ध काम करने लगे, तो स्थिति अलग होती है। तब उसे नष्ट करने के लिए बाहर से किसी बड़े हमले की आवश्यकता नहीं रहती। वह स्वयं अपनी कमजोरियों को मजबूत करता हुआ आगे बढ़ता रहता है।
मानवीय मस्तिष्क भी किसी कंप्यूटर की तरह है। कंप्यूटर में पड़ा एक छोटा-सा वायरस कभी-कभी पूरे सिस्टम को प्रभावित कर देता है। उसी तरह मनुष्य के विचारों में बैठी एक छोटी-सी गलत धारणा उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकती है। जब व्यक्ति का विवेक कमजोर हो जाता है, तो वह केवल अपने लिए ही समस्या नहीं बनता, बल्कि परिवार, समाज और अंततः पूरे राष्ट्र के लिए समस्या बन सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि किसी व्यक्ति के भीतर यह बदलाव आता कैसे है?
इसका उत्तर उसके जन्म से लेकर उसके पूरे सामाजिक विकास की यात्रा में छिपा हुआ है।
जब भारत के किसी ग्रामीण, निम्न-मध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय परिवार में एक बच्चा जन्म लेता है, तब वह किसी जाति, धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक वर्ग या सामाजिक प्रतिष्ठा की समझ लेकर पैदा नहीं होता। उसके भीतर जानने की उत्सुकता होती है। वह हर चीज को आश्चर्य से देखता है। वह सवाल पूछता है, चीजों को छूकर समझना चाहता है, गिरकर उठता है, खेलता है, कल्पना करता है और अपनी दुनिया स्वयं बनाता है। उसके भीतर संभावनाओं की कोई कमी नहीं होती।
लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके चारों ओर एक अदृश्य घेरा बनना शुरू हो जाता है।
सबसे पहले परिवार उसे बताता है कि उसे कैसा होना चाहिए। फिर समाज बताता है कि उसे क्या करना चाहिए। स्कूल बताता है कि उसे क्या पढ़ना चाहिए। रिश्तेदार बताते हैं कि उसे किस रास्ते पर चलना चाहिए। जाति उसे उसकी सामाजिक पहचान देती है। धर्म उसे कुछ मान्यताएं देता है। आर्थिक स्थिति उसके विकल्प सीमित करती है। रोजगार की चिंता उसके निर्णयों को प्रभावित करती है। राजनीति उसके आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है और प्रशासन उस वातावरण को नियमों और प्रक्रियाओं के माध्यम से नियंत्रित करता है।
धीरे-धीरे एक स्वतंत्र बच्चा सामाजिक अपेक्षाओं से संचालित व्यक्ति बन जाता है।
यहीं से इस चक्रव्यूह की शुरुआत होती है।

About the Author

आर. एस. सारथी (R. S. Sarthi) मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित एक छोटे से गांव भटौआ से आते हैं इनके पिता श्री पहलवान सिंह एक मध्यवर्गीय किसान है और इनकी माता श्रीमती रीना बाई एक सामान्य गृहणी है। सारथी एक यथार्थवादी लेखक, वक्ता और शिक्षक हैं, जिनकी शिक्षा एवं शिक्षण में विशेष रुचि है। उनका लेखन मुख्यतः मनुष्य, उसके जीवन और उसके सामाजिक संसार के इर्द-गिर्द केंद्रित है। वे मानवीय भावनाओं, मानसिक संघर्षों, प्रेम, रिश्तों, सामाजिक व्यवहार, युवाओं और किशोरों के जीवन तथा समाज और संस्कृति से जुड़े विविध पहलुओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाते हैं। उनके लेखन का मूल उद्देश्य जीवन और समाज के उन सत्यों को सामने लाना है, जिन्हें अक्सर भ्रम, रूढ़ियों, भय या दिखावे के पीछे छिपा दिया जाता है। वे सही को सही और गलत को गलत कहने, सामाजिक मान्यताओं पर प्रश्न उठाने और जीवन को जैसा है, वैसा ही समझने की दृष्टि में विश्वास रखते हैं। उनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति या मनोरंजन नहीं, बल्कि सत्य की खोज, सामाजिक संवाद और मानवीय चेतना को दिशा देने का माध्यम है।
वे उपन्यास, कहानी, संस्मरण, डायरी, जीवनी तथा वैचारिक और चिंतनपरक लेखन जैसी विभिन्न विधाओं में सक्रिय हैं। विशेष रूप से युवाओं और किशोरों के मानसिक एवं सामाजिक संसार, मानवीय संबंधों और जीवन की जटिलताओं को समझना उनके लेखन का महत्वपूर्ण पक्ष है। वे अपनी रचनाओं के साथ-साथ ऐसे लोगों की जीवन-कथाओं और अनुभवों को भी शब्द देने के लिए उनके साथ सहयोग करते हैं, जिनके पास कहने के लिए कुछ महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे व्यक्त करने का माध्यम नहीं। आर. एस. सारथी के लिए लेखन लोकप्रियता या व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं, बल्कि जीवन के सत्य को पहचानने, मानवीय अनुभवों को समझने और आने वाली पीढ़ियों के लिए विचार एवं अनुभव की सार्थक विरासत छोड़ने का प्रयास है।

Book Details

Publisher: Self-Published
Number of Pages: 161
Availability: Available for Download (e-book)

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चक्रव्यूह

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