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कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं…
वे महसूस की जाती हैं।
“काली घटा – एक लड़की” ऐसी ही एक कहानी है।
यह सिर्फ नंदिनी की कहानी नहीं है।
यह उन लाखों लड़कियों की कहानी है जो हर दिन छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ती हैं—बिना शोर किए, बिना शिकायत किए, बस आगे बढ़ने के लिए।
यह कहानी उन सुबहों की है जो अपनी नहीं होतीं।
उन सपनों की है जिन्हें बार-बार समझौते का नाम दिया जाता है।
उन सवालों की है जो समाज पूछता है, लेकिन जवाब कभी सुनना नहीं चाहता।
एक लड़की की जिंदगी में आने वाली मुश्किलें हमेशा बड़ी नहीं होतीं—
कभी-कभी वे बहुत छोटी होती हैं… इतनी छोटी कि लोग उन्हें समस्या मानते ही नहीं।
लेकिन वही छोटी-छोटी बातें धीरे-धीरे एक काली घटा बन जाती हैं।
यह किताब संघर्ष की कहानी है, लेकिन सिर्फ संघर्ष की नहीं।
यह हिम्मत की कहानी है।
आवाज़ उठाने की कहानी है।
अपने सपनों को चुनने की कहानी है।
और सबसे ज़रूरी—अपने लिए जीने की कहानी है।
नंदिनी की यात्रा बचपन से शुरू होती है, जब फर्क सिर्फ शब्दों में होता है।
फिर वही फर्क फैसलों में बदलता है।
और धीरे-धीरे… पूरी जिंदगी की दिशा तय करने लगता है।
इस कहानी में आपको समाज दिखेगा।
परिवार दिखेगा।
डर दिखेगा।
और उम्मीद भी।
क्योंकि हर काली घटा हमेशा अंधेरा नहीं लाती—
कभी-कभी वही हमें इंद्रधनुष तक लेकर जाती है।
अगर इस किताब को पढ़ते समय आपको कहीं अपनी कहानी दिखाई दे…
तो समझिए यह किताब अपना मकसद पूरा कर चुकी है।
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