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‘अन्धा प्रेम’ यह एक गर्भवती माता द्वारा अपने सन्तान के प्रति (जो अभी तक इस संसार में जन्म भी नहीं लिया उसके प्रति) आँख मूँद कर प्रेम करने की एक अद्भुत प्रक्रिया है। सुरेश और माया को बहुत समय से पुत्र नहीं हो रहा था, परन्तु एक दिन उन पर ईश्वर की कृपा हुई। उन्होंने अखण्ड श्रीरामचरितमानस का पाठ कर एक श्रेष्ठ यज्ञ किया और उसके पश्चात् माया गर्भवती हो गई। जब यह सुनिश्चित हो गया कि माया अब गर्भवती है तभी से माया अपने भविष्य पर अर्थात् जो अभी गर्भ में ही विकसित हो रहा है उस सन्तान पर अटूट प्रेम करने लगी। वह शृङ्गार रस को केन्द्रीत करते हुए अपने (भविष्य) पुत्र को माध्यम बनाकर प्रेम के महत्व को सर्वोच्च किया। माता का पुत्र के प्रति इतना लगाव हो गया कि उन्हें पुत्र के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता था। वह प्रेम में केवल पुत्र को ही देखती थी और उस पर महान् प्रेम का न्योछावर करती थी। पुत्र तो गर्भ में है भला उसे देखा जा सकता है? उसे केवल मन की आँखों से देखा जा सकता है, जो एक माता के लिए सम्भव है। गर्भ में पुत्र को मात्र नेत्र मूँद कर ही देखा जा सकता है, जिसका उपयोग माया ने किया। माया ने अपने पुत्र पर नयन मूँद स्मरणिय अद्भुत प्रेम किया, जो सभी को अचम्भित कर देने वाला था। अतः एक माता को अपने पुत्र के प्रति नयन मूँद प्रेम करना ही अन्धा प्रेम कहलाता है।
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