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अन्धा प्रेम (eBook)

Type: e-book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi, Sanskrit
Price: ₹99
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

‘अन्धा प्रेम’ यह एक गर्भवती माता द्वारा अपने सन्तान के प्रति (जो अभी तक इस संसार में जन्म भी नहीं लिया उसके प्रति) आँख मूँद कर प्रेम करने की एक अद्भुत प्रक्रिया है। सुरेश और माया को बहुत समय से पुत्र नहीं हो रहा था, परन्तु एक दिन उन पर ईश्वर की कृपा हुई। उन्होंने अखण्ड श्रीरामचरितमानस का पाठ कर एक श्रेष्ठ यज्ञ किया और उसके पश्चात् माया गर्भवती हो गई। जब यह सुनिश्चित हो गया कि माया अब गर्भवती है तभी से माया अपने भविष्य पर अर्थात् जो अभी गर्भ में ही विकसित हो रहा है उस सन्तान पर अटूट प्रेम करने लगी। वह शृङ्गार रस को केन्द्रीत करते हुए अपने (भविष्य) पुत्र को माध्यम बनाकर प्रेम के महत्व को सर्वोच्च किया। माता का पुत्र के प्रति इतना लगाव हो गया कि उन्हें पुत्र के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता था। वह प्रेम में केवल पुत्र को ही देखती थी और उस पर महान् प्रेम का न्योछावर करती थी। पुत्र तो गर्भ में है भला उसे देखा जा सकता है? उसे केवल मन की आँखों से देखा जा सकता है, जो एक माता के लिए सम्भव है। गर्भ में पुत्र को मात्र नेत्र मूँद कर ही देखा जा सकता है, जिसका उपयोग माया ने किया। माया ने अपने पुत्र पर नयन मूँद स्मरणिय अद्भुत प्रेम किया, जो सभी को अचम्भित कर देने वाला था। अतः एक माता को अपने पुत्र के प्रति नयन मूँद प्रेम करना ही अन्धा प्रेम कहलाता है।

About the Author

ऋषभ विश्वकर्मा एक प्रतिभाशाली युवक हैं, जिनका जन्म सम्वत्सर २०५७ भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि (सन् ०३/०९/२०००) पूर्वाह्न ०७:२४ बजे, मोहल्ला : शङ्करपुर, ग्राम और पोस्ट : लहुआँ कलां, जनपद : आजमगढ़, राज्य : उत्तर प्रदेश, देश : भारत में एक धार्मिक परिवार में हुआ था और जिनकी शिक्षा-दीक्षा एक समर्पित वातावरण में हुई। बचपन से ही ऋषभ को प्रेम, भक्ति, रामायण गेय, साहित्य और संगीत में गहरी रुचि रही है। उनके गुरु राधेश्याम विश्वकर्मा ने (जो ऋषभ के पिता भी है) उन्हें सनातन धर्म के मूल्यों और परम्पराओं से परिचित कराया। ऋषभ ने भक्ति रस में प्रथम पुस्तक "श्रीरामभजन्" लिखा है और इस में भजन् स्वयं को राम के दास के रूप में दर्शाया है, जिसके कारण ऋषभ का नाम ऋषभदास हुआ। इनके पिता का नाम राधेश्याम विश्वकर्मा, माता का नाम बाला देवी और भ्राता अनुज का नाम शुभम विश्वकर्मा है।

ऋषभ ने अपनी रचनात्मकता को अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी लिखी गई कृति "श्रीरामभजन्", "शिवभजन्", "भजन् मञ्जरी", "अत्यन्त लघु ज्ञान और "कविता मञ्जरी" ने धार्मिक समुदाय में विशेष पहचान बनाई है।

ऋषभ का जीवन दर्शन उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है, जो प्रेम, भक्ति, ज्ञान, करुणा और सद्भावना का संदेश देती हैं। वे अपने कुल देवता श्री विश्वकर्मा की प्रेरणा से सतत् आगे बढ़ रहे हैं। उनकी रचनाएँ न केवल आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार हैं, अपितु वे युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं।

आजमगढ़ जिले के लहुआँ कलां गाँव के निवासी ऋषभ का जीवन सरलता और सादगी से भरा है। उनके कार्यों और विचारों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रयत्न जारी है। वे अपने परिवार के साथ अपने गाँव में रहते हैं, जहाँ वे समाज सेवा और शिक्षा और दीक्षा के क्षेन में योगदान देने की दिशा में प्रयासरत हैं। उनका लक्ष्य अपने गाँव और समाज को आगे बढ़ाना और समृद्ध बनाना है।

Book Details

Publisher: ऋषभ विश्वकर्मा
Number of Pages: 28
Availability: Available for Download (e-book)

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