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बचपन में दशहरे का मेला (eBook)

गुब्बारे, जलेबी, खिलौने और बचपन की वो अनमोल यादें
Type: e-book
Genre: Children, Drama/Play
Language: Hindi
Price: ₹51
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

क्या आपको अपना बचपन याद है, जब दशहरे का मेला पूरे साल के सबसे खास दिनों में से एक हुआ करता था?

मेले का नाम सुनते ही मन खुशी से भर जाता था। नए कपड़े पहनने की उत्सुकता, घरवालों के साथ जाने की तैयारी, रास्ते भर खिलौनों और मिठाइयों की बातें और मेले में पहुँचते ही चारों तरफ दिखाई देती रंग-बिरंगी दुकानों की चमक—सब कुछ कितना खास लगता था!

कहीं गुब्बारे बिक रहे होते थे, कहीं लकड़ी की तलवारें और छोटे-छोटे खिलौने सजे होते थे। जलेबी की खुशबू, चाट की दुकानें, झूले, भीड़ का शोर और दूर से दिखाई देता रावण का विशाल पुतला मेले की रौनक को और बढ़ा देता था।

बचपन में हमारी खुशियाँ कितनी छोटी हुआ करती थीं। मनपसंद खिलौना मिल जाए तो लगता था जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गई हो। माता-पिता से कोई चीज खरीदवाने के लिए बार-बार कहना, दोस्तों के साथ घूमना, भीड़ में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलना और घर लौटते समय अपनी पसंद की चीज को बार-बार देखकर खुश होना—ये सभी पल आज भी यादों में बसे रहते हैं।

बचपन में दशहरे का मेला ऐसी ही खूबसूरत यादों की एक भावनात्मक यात्रा है। यह किताब उस दौर की याद दिलाने की कोशिश करती है, जब मनोरंजन के लिए मोबाइल स्क्रीन की जरूरत नहीं होती थी। परिवार के साथ मेले में जाना, दोस्तों के साथ घूमना और छोटी-छोटी चीजों में खुशियाँ ढूँढ़ना ही त्योहार का असली आनंद होता था।

इस किताब के पन्नों में आपको बचपन की मासूमियत, मेले की चहल-पहल, त्योहारों की रौनक और परिवार के साथ बिताए पलों का अपनापन महसूस होगा। यह उन सभी लोगों के लिए है, जो अपने बचपन के दिनों को याद करना चाहते हैं और आज की पीढ़ी को बताना चाहते हैं कि बिना महँगे खिलौनों और डिजिटल मनोरंजन के भी खुशियाँ कितनी बड़ी हुआ करती थीं।

चाहे आपने छोटे कस्बे का मेला देखा हो या शहर का बड़ा दशहरा उत्सव, संभव है कि इस किताब का कोई दृश्य आपको अपने बचपन की याद दिला दे।

कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी एक छोटे-से खिलौने, एक गरम जलेबी और परिवार के साथ बिताई गई एक शाम में छिपी होती है।

आइए, लौट चलें उस बचपन में, जहाँ दशहरे का मेला सिर्फ घूमने की जगह नहीं, बल्कि पूरे साल याद रहने वाला एक खूबसूरत अनुभव हुआ करता था।

About the Author

एक हमसफ़र हिंदी में ऐसी किताबें लिखने में रुचि रखते हैं, जो जिंदगी के साधारण पलों में छिपी खूबसूरती, रिश्तों की गर्माहट और बीते समय की यादों को शब्दों में पिरोती हैं। उनका मानना है कि जिंदगी की सबसे प्यारी यादें अक्सर उन्हीं छोटे-छोटे पलों से बनती हैं, जिन्हें उस समय हम सामान्य समझकर जी लेते हैं, लेकिन बाद में वही पल हमारे चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं।

उनके लेखन का अंदाज़ सरल, सहज और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। वे बचपन की शरारतों, परिवार के साथ बिताए समय, दोस्ती, त्योहारों और बदलती जीवनशैली जैसे विषयों को इस तरह प्रस्तुत करना पसंद करते हैं कि पाठक कहानी पढ़ते हुए खुद को उसका हिस्सा महसूस करे।

एक हमसफ़र की कोशिश है कि उनकी किताबें पाठकों को सिर्फ मनोरंजन ही न दें, बल्कि उन्हें अपनी पुरानी यादों से दोबारा जुड़ने का मौका भी दें। उनकी नजर में हर इंसान के भीतर एक ऐसा बच्चा आज भी रहता है, जो कभी मेले में खिलौने के लिए जिद करता था, गुब्बारा पाकर खुश हो जाता था और घर लौटते समय भी अपने मन में मेले की रौनक सँजोए रहता था।

उनका उद्देश्य सरल हिंदी में ऐसी कहानियाँ और किताबें प्रस्तुत करना है, जिनमें अपनापन हो, जीवन की सच्चाई हो और पाठक को अपने बीते दिनों की एक झलक जरूर मिले।

Book Details

Publisher: एक हमसफ़र
Number of Pages: 12
Availability: Available for Download (e-book)

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बचपन में दशहरे का मेला

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