You can access the distribution details by navigating to My pre-printed books > Distribution
क्या आपको 90 के दशक की वह क्रिकेट याद है, जब गली ही हमारा मैदान होती थी, ईंटें विकेट बनती थीं और पुराना बल्ला भी किसी खज़ाने से कम नहीं लगता था?
मैच के दौरान झगड़े, आउट होने पर बहस, गेंद ढूँढ़ने के लिए घरों के चक्कर और शाम होने तक खेलने की ज़िद—ये सिर्फ़ खेल नहीं थे, बचपन की खूबसूरत यादें थीं।
आज की पीढ़ी के पास मोबाइल गेम, ऑनलाइन दोस्ती और अनगिनत स्क्रीन हैं। लेकिन क्या बचपन के खेलने और दोस्ती करने का तरीका भी बदल गया है?
यह किताब 90 के दशक की धूल-मिट्टी वाली क्रिकेट और आज की स्क्रीन पर केंद्रित दुनिया के बीच एक दिलचस्प तुलना प्रस्तुत करती है। इसमें पुरानी यादें, गली-मोहल्ले के मज़ेदार किस्से, बदलती जीवनशैली और बच्चों के खेल-कूद पर तकनीक के प्रभाव को सरल हिंदी में समझाया गया है।
यह किताब उन पाठकों के लिए है जो अपना बचपन फिर से याद करना चाहते हैं, अपने बच्चों को उस दौर की कहानियाँ सुनाना चाहते हैं और समझना चाहते हैं कि बदलते समय में खेल, दोस्ती और साथ बिताए पलों का क्या महत्व है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book 90 के दशक की धूल-मिट्टी वाली क्रिकेट बनाम आज की स्क्रीन में खोई पीढ़ी.