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पृथ्वी अभी भी साँस ले रही है—लेकिन उसकी साँसों में हमारी दुनिया के संघर्ष सुनाई देते हैं।
केशव लामिछाने का यह हिंदी उपन्यास जलवायु संकट, युद्ध, असमानता, प्रवासन और बदलती तकनीक के बीच इंसानी जीवन की कहानी प्रस्तुत करता है। इसके 28 अध्यायों में भय और कठिनाइयों के साथ करुणा, साहस और उम्मीद भी जगह पाते हैं।
वर्ष 2026 की वैश्विक परिस्थितियों से प्रेरित यह काल्पनिक रचना एक प्रश्न उठाती है: हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी पृथ्वी छोड़ेंगे?
यह उस ग्रह की कहानी है जो घायल होकर भी साँस ले रहा है—और उन लोगों की, जिनके छोटे प्रयास उसका भविष्य बदल सकते हैं।
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