Description
प्रथम खंड मूलतः स्मृति में सुरक्षित उस संसार का काव्यात्मक दस्तावेज़ है जो समय के साथ धीरे-धीरे ओझल होता गया। यहाँ ‘मोहल्ला’ केवल कोई भौगोलिक स्थान नहीं है; वह रिश्तों, आवाज़ों, घरेलू संस्कारों, पड़ोस की आत्मीयता, बहुभाषिक संवाद और साझी सांस्कृतिक विरासत से निर्मित एक जीवंत संसार है। कवि व्यक्तिगत स्मृतियों के माध्यम से उस सामूहिक जीवन को पुनः उपस्थित करते हैं जिसमें सामान्य-सी प्रतीत होने वाली घटनाएँ भी गहरी मानवीय अर्थवत्ता ग्रहण करती हैं। बचपन यहाँ केवल जीवन का एक बीता हुआ काल नहीं, बल्कि वर्तमान के भीतर अब भी साँस लेती हुई स्मृति है।
द्वितीय खंड इसी स्मृति-यात्रा की निरंतरता, वैचारिक गहराई और आत्मपरक परिणति है। यह प्रथम खंड की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसी संसार को समय, दूरी, परिपक्व अनुभव, बदलते संबंधों, बिछोह और आत्मचिंतन की दृष्टि से पुनः देखने का प्रयास है। जहाँ प्रथम खंड में कवि स्मृति में लौटकर खोए हुए संसार को पुनर्जीवित करते हैं, वहीं द्वितीय खंड में वे उसी संसार के साथ जीते हुए उसके अर्थ को समझने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार स्मृति अतीत में लौटने का माध्यम भर नहीं रहती; वह वर्तमान को समझने और मनुष्य के भीतर महफ़ूज़ संसार की पहचान करने का साधन बन जाती है।
डॉ. चंद्रशेखर बंसीलाल शर्मा कवि, अनुवादक, साहित्यिक आलोचक और अध्यापक हैं। वे श्रीमती रेवाबेन मनोहरभाई पटेल महिला कला महाविद्यालय, भंडारा, महाराष्ट्र में अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष हैं। तीन दशकों से अधिक की अपनी अकादमिक और साहित्यिक यात्रा में उन्होंने अध्यापन, शोध, सृजनात्मक लेखन और अनुवाद के माध्यम से भारतीय भाषाओं तथा विश्व-साहित्य के बीच एक सार्थक संवाद विकसित किया है। हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, डोगरी और मराठी पर उनकी पकड़ ने उनके साहित्यिक कर्म को एक बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है।
डॉ. शर्मा की काव्य-दृष्टि का केंद्रीय सरोकार स्मृति, स्थान, समय और मानवीय अनुभव है। उनके यहाँ स्मृति केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और मानवीय अस्तित्व की गहरी परतों तक पहुँचने का एक सृजनात्मक माध्यम है। बचपन, घर, पड़ोस, रिश्ते, लोक-संस्कृति और बदलते सामाजिक परिवेश जैसे साधारण प्रतीत होने वाले अनुभव उनकी कविता में व्यापक मानवीय अर्थ ग्रहण करते हैं। उनकी कविताओं में निजी जीवन की स्मृतियाँ धीरे-धीरे सामूहिक स्मृति का रूप लेती हैं और एक व्यक्ति की कहानी अपने समय और समाज की कहानी में रूपांतरित हो जाती है।
अनुवाद उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम है। डॉ. शर्मा अनुवाद को शब्दों के यांत्रिक स्थानांतरण के रूप में नहीं, बल्कि अर्थ, संवेदना, सांस्कृतिक संदर्भ और रचनात्मक आत्मा के पुनर्सृजन के रूप में देखते हैं। उनकी अनुवाद-दृष्टि में मूल रचना के प्रति निष्ठा और लक्ष्य-भाषा की स्वाभाविक काव्यात्मकता के बीच संतुलन विशेष महत्त्व रखता है। साहित्यिक अनुवाद के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा प्रतिष्ठित मामा वरेरकर अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।उनका पहला कविता-संग्रह ‘अंतर्द्वंद्व के शिकार’ २००६ में कृति प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘ड्रॉपलेट्स ऑफ़ डिलेम्मा’ २०२५ में ई-बुक के रूप में प्रकाशित हुआ। उनके महत्वपूर्ण अनुवाद-कर्म में ‘बंजर भूमि’ (२०१०), टी. एस. एलियट की द वेस्ट लैंड का हिंदी रूपांतरण, तथा ‘डोगरी कथा-कुंज’ (२०१६), साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित डोगरी कहानी-संकलन का हिंदी अनुवाद, उल्लेखनीय हैं।२०२५ में प्रकाशित उनका मौलिक हिंदी-हिंदुस्तानी कविता-संग्रह ‘डल के किनारे, बुद्ध खड़ा है!’ कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति, शांति की आकांक्षा और समकालीन मनुष्य की नैतिक बेचैनियों को केंद्र में रखता है। इस संग्रह में कश्मीर केवल एक भौगोलिक प्रदेश के रूप में नहीं, बल्कि स्मृति, सह-अस्तित्व और मानवीय आकांक्षा के एक जटिल सांस्कृतिक रूपक के रूप में उपस्थित होता है। इसका अंग्रेज़ी संस्करण ‘बुद्धा स्टैंड्स ऑन द बैंक्स ऑफ़ डल!’ भी २०२५ में ई-बुक के रूप में प्रकाशित हुआ। जुलाई २०२५ में प्रकाशित ‘विलियम बटलर यीट्स: प्रतिनिधि कविताएँ’ में डब्ल्यू. बी. यीट्स की चयनित कविताओं का हिंदी-हिंदुस्तानी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। इस कृति में यीट्स की रहस्यात्मक चेतना, प्रतीकात्मकता, संगीतात्मकता और दार्शनिक अंतर्दृष्टि को भारतीय पाठक के लिए एक सहज, समकालीन और काव्यात्मक भाषा में रूपांतरित करने का प्रयास किया गया है।
डॉ. शर्मा की काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण विस्तार ‘बड़े नाल साहब मोहल्ला एंड अदर पोएम्स, वॉल्यूम I’ के रूप में जुलाई २०२६ में सामने आया। यह मूल अंग्रेज़ी कविताओं का संग्रह है, जिसमें बचपन की स्मृतियों, पारिवारिक जीवन, पड़ोस, गलियों, घरेलू संसार, भाषाई सह-अस्तित्व और साझी तहज़ीब के माध्यम से एक विलुप्तप्राय सामाजिक संसार का काव्यात्मक पुनर्स्मरण किया गया है। यहाँ मोहल्ला केवल रहने की जगह नहीं रह जाता; वह संबंधों, विश्वासों, आवाज़ों और साझा जीवन-मूल्यों से निर्मित एक सांस्कृतिक भूगोल में बदल जाता है। यह कृति स्व-प्रकाशित ई-बुक, पोथी.कॉम, बेंगलुरु द्वारा संचालित रूप में प्रकाशित हुई।‘बड़े नाल साहब मोहल्ला एंड अदर पोएम्स, वॉल्यूम II’ (२०२६) इसी काव्य-परियोजना का अगला और अधिक आत्मपरक विस्तार है। जहाँ प्रथम खंड स्मृति में सुरक्षित एक सामाजिक संसार को पुनः उपस्थित करता है, वहीं द्वितीय खंड उस संसार को समय, अनुभव और आत्मचिंतन की दृष्टि से पुनः देखता है।
‘बड़े नाल साहब मोहल्ला और अन्य कविताएँ, प्रथम खंड’, जो जुलाई 2026 में हिंदुस्तानी में प्रकाशित हुआ, उसी मौलिक काव्य-परियोजना का स्वाभाविक विस्तार ‘बड़े नाल साहब मोहल्ला और अन्य कविताएँ, द्वितीय खंड’ है।इसमें बचपन और परिपक्वता के बीच का अंतराल, घर और उससे दूर होने की अनुभूति, रिश्तों की बदलती प्रकृति, समय की क्षयशीलता, स्मृति की विश्वसनीयता और मनुष्य की आंतरिक फ़िक्र जैसे प्रश्न अधिक गहराई से उभरते हैं। निजी स्मृतियाँ यहाँ क्रमशः सामूहिक अनुभव का रूप ग्रहण करती हैं और एक छोटे-से मोहल्ले की कथा व्यापक मानवीय स्थिति का रूपक बन जाती है।
इन दोनों खंडों में ‘बड़े नाल साहब मोहल्ला’ एक स्थान से अधिक एक सांस्कृतिक स्मृति-प्रदेश है—एक ऐसा संसार जहाँ घर और पड़ोस, भाषा और संस्कृति, धार्मिक आस्थाएँ और मानवीय रिश्ते रोज़मर्रा के जीवन में एक-दूसरे से संवाद करते थे। गलियों की आवाज़ें, घरों की रौनक, बुज़ुर्गों की उपस्थिति, बच्चों की दुनिया, त्योहारों की साझी ख़ुशियाँ और जीवन की मामूली-सी घटनाएँ मिलकर उस सामूहिक जीवन का दस्तावेज़ बनती हैं, जिसे समय धीरे-धीरे विस्मृति की ओर ले जाता है। कवि उस संसार को केवल नॉस्टैल्जिया के लिए पुनर्जीवित नहीं करता; वह यह पूछता है कि मनुष्य की पहचान, उसकी संवेदना और उसकी इंसानियत का कितना हिस्सा उसकी साझा स्मृतियों में महफ़ूज़ रहता है।
डॉ. शर्मा के साहित्य में स्मृति एक सृजनात्मक शक्ति है। वह अतीत को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करते हुए वर्तमान के अर्थों को भी उजागर करती है। उनकी कविता में व्यक्तिगत अनुभव व्यापक मानवीय अनुभव से जुड़ता है और स्थानीय जीवन सार्वभौमिक संवेदना का रूप ग्रहण करता है। इसीलिए उनके यहाँ एक मोहल्ला केवल एक मोहल्ला नहीं रहता, एक घर केवल एक घर नहीं रहता और एक बचपन केवल एक व्यक्ति का बचपन नहीं रहता—वे सब मिलकर समय, समाज और मनुष्य की साझा कथा बन जाते हैं।मूल कविता हो या अनुवाद, डॉ. शर्मा का साहित्यिक कर्म भाषाओं के बीच आवाजाही भर नहीं, बल्कि संस्कृतियों के बीच संवाद और मनुष्यों के बीच आत्मीयता स्थापित करने का प्रयास है। उनकी रचनात्मक आस्था इस विश्वास पर आधारित है कि साहित्य उन अनुभवों को महफ़ूज़ रख सकता है जिन्हें इतिहास प्रायः दर्ज नहीं करता; कविता उन आवाज़ों को सुनाई दे सकती है जो समय के शोर में दब जाती हैं; और शब्द उन मानवीय रिश्तों को फिर से जोड़ सकते हैं जिन्हें दूरी, विस्मृति और समय धीरे-धीरे अलग कर देते हैं।उनकी कविता अंततः स्मृति को शोक में नहीं, मानवीय निरंतरता में रूपांतरित करती है—और यही उसकी सबसे गहरी साहित्यिक शक्ति है।