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कुछ जगहें ढहाए जाने से बहुत पहले ही मिटने लगती हैं। वे बस यादों में ज़िंदा रहती हैं—भूली-बिसरी आवाज़ों की लय में, बारिश के बाद भीगे हुए आँगनों की ख़ुशबू में, किसी पुराने इमली के पेड़ की छाँव में, और उस गली में पड़ोसी की आवाज़ की दूर तक जाती हुई गूँज में। बड़े नाल साहब मोहल्ला और अन्य कविताएँ — खंड I ऐसी ही एक दुनिया को ख़ामोशी में गुम हो जाने से पहले फिर से याद करने और बचा लेने की एक कोशिश है।
मध्य भारत के एक छोटे-से भारतीय मोहल्ले में कवि के बचपन की स्मृतियों से जन्मी यह काव्य-कृति निजी यादों को स्मृति, अपनत्व और इंसानी रिश्तों की नाज़ुक बनावट पर एक गहरे चिंतन में बदल देती है। यहाँ मोहल्ला महज़ पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि इस किताब का केंद्रीय किरदार है—एक ज़िंदा वजूद, जहाँ हर गली, हर चौखट, हर स्कूल, हर मज़ार, हर आँगन और हर छत पर अनगिनत गुमनाम ज़िंदगियों की छाप दर्ज है।
इन कविताओं की दुनिया मशहूर और नामवर शख़्सियतों से नहीं, बल्कि उन साधारण लोगों से आबाद है जिनकी ज़िंदगियों में असाधारण भावनात्मक गूँज छिपी हुई है। बुज़ुर्ग, माँ-बाप, पड़ोसी, उस्ताद, विधवाएँ, मज़दूर, घूम-घूमकर तमाशा दिखाने वाले कलाकार और भुला दी गई औरतें—ये सब बड़ी आत्मीयता और कोमलता के साथ सामने आते हैं और एक साझा नैतिक संसार का हिस्सा बन जाते हैं। बड़े ताऊजी, बेला बाई, तारा बाई, पापाजी, जैसे किरदार एक साथ बेहद निजी भी हैं और ख़ामोशी से एक व्यापक मानवीय रूपक भी बन जाते हैं। वे उन अनगिनत ज़िंदगियों की नुमाइंदगी करते हैं जिन्हें इतिहास की सरकारी किताबों में शायद ही कभी जगह मिलती है, लेकिन जिन्होंने उन्हें जानने वालों की यादों में हमेशा के लिए अपना घर बना लिया है।
इन चरित्र-चित्रों के साथ-साथ ऐसी कविताएँ भी हैं जो रोज़मर्रा की मामूली चीज़ों और अनुभवों को प्रतीक में बदल देती हैं। ताला, जूँ, विरासत, चमड़ी और ग़ुलामी जैसी साधारण चीज़ें ऐसे रूपकों में ढल जाती हैं जिनके ज़रिए कवि पहचान, स्मृति, गरिमा, मृत्यु, प्रेम और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चुपचाप पहुँचने वाली उन अदृश्य विरासतों की पड़ताल करता है। यह संग्रह लगातार निजी और सार्वभौमिक के बीच आवाजाही करता है और इस एहसास को गहरा करता है कि बचपन की सबसे छोटी-सी घटना में भी ज़िंदगी की सबसे गहरी दार्शनिक सच्चाइयाँ छिपी हो सकती हैं।
मध्य भारत के एक ख़ास भूगोल में जड़ें जमाए होने के बावजूद ये कविताएँ अपनी जगह और सरहदों से बहुत आगे निकल जाती हैं। इनमें एक ऐसी दुनिया की झलक मिलती है जहाँ हिंदू और मुसलमानों के घर, त्योहार और इबादतें, मोहब्बत और मातम—सब बिना किसी बनावट के एक-दूसरे के साथ जीते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि समाज की असली बुनावट बड़े-बड़े ऐलानों से नहीं, बल्कि पड़ोसी होने की रोज़मर्रा की छोटी-छोटी रस्मों, रिश्तों और इंसानी सरोकारों से तैयार होती है। मोहल्ला यहाँ पूरे समाज और समुदाय का रूपक बन जाता है—एक ऐसी जगह, जहाँ इंसान की पहचान तन्हाई में नहीं, बल्कि दूसरों के साथ बाँटी हुई ज़िंदगी में आकार लेती है।
संवेदी बारीकियों, काव्यात्मक सटीकता और ख़ामोश मगर गहरी भावनात्मक तीव्रता से भरी भाषा में लिखी गई बड़े नाल साहब मोहल्ला और अन्य कविताएँ स्मृति-साहित्य की परंपरा से जुड़ते हुए भी पूरी तरह आज के समय की किताब है। ये कविताएँ अतीत का सम्मान करती हैं, लेकिन महज़ नॉस्टैल्जिया में नहीं डूबतीं। वे समझती हैं कि स्मृति घर लौटने की कोशिश नहीं होती; बल्कि यह जानने का एक रास्ता होती है कि हमारे लिए घर का अर्थ आज भी क्या है।
अपने केंद्र में यह किताब हमारे बचपन के उन गुमनाम रखवालों की किताब है—वे लोग जिनके नाम शायद कभी इतिहास में दर्ज नहीं हुए, लेकिन जिनकी मौजूदगी हमारे भीतर तब भी बनी रहती है जब गलियाँ बदल जाती हैं, घर खंडहर हो जाते हैं और पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं। यह ग़ायब होते मोहल्लों के नाम एक मातमी गीत है; साधारण ज़िंदगियों का उत्सव है; और कविता की उस ताक़त का प्रमाण है जो भुला दिए गए और अनदेखे लोगों को गुमनामी की अँधेरी तहों से निकालकर फिर से ज़िंदा कर सकती है।
एक भूले-बिसरे मोहल्ले को आवाज़ देते हुए चंद्रशेखर बंसीलाल शर्मा आख़िरकार हर उस पाठक से मुख़ातिब होते हैं जिसने कभी अपने भीतर एक ऐसा अदृश्य वतन सँभालकर रखा है—एक ऐसा वतन जो नक़्शे पर कहीं नहीं मिलता, मगर जिसकी गलियाँ आज भी हमारी यादों में आबाद हैं।
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