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यह सुंदर हिंदी चित्रपुस्तक ईश उपनिषद् के गहन दर्शन को सरल भाषा, मनमोहक चित्रों और एक बालक की आत्मचिंतनपूर्ण यात्रा के माध्यम से प्रस्तुत करती है। संसार की निरंतर हलचल को देखते हुए बालक जीवन, संतोष, स्वामित्व, कर्म, भय और वास्तविक शांति से जुड़े प्रश्नों पर विचार करता है।
धीरे-धीरे उसे अनुभव होता है कि समस्त सृष्टि एक गहरी एकता से जुड़ी है; कर्म करना समस्या नहीं, बल्कि उस मूल सत्य को भूल जाना समस्या है। पुस्तक पाठक को वस्तुओं पर अधिकार जमाए बिना उनका आनंद लेने, चिंता के बिना कर्म करने और प्रत्येक जीव में उसी चेतना को पहचानने के लिए प्रेरित करती है।
बच्चों और वयस्कों—दोनों के लिए रचित यह पुस्तक प्राचीन उपनिषदिक ज्ञान का सहज एवं आधुनिक हिंदी रूपांतरण है। इसकी यात्रा अंतिम पृष्ठ पर समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर मौन, सजगता और आत्मचिंतन के रूप में आगे बढ़ती रहती है।
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