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छान्दोग्य उपनिषद: एक शाश्वत ज्ञान की दृश्य यात्रा भारतीय ज्ञान परंपरा के सबसे महान उपनिषदों में से एक को आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सरल, प्रेरणादायक और दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने का एक अनूठा प्रयास है। यह केवल एक धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथ का परिचय नहीं है, बल्कि आत्म-अन्वेषण, आत्म-जागरण और सार्वभौमिक एकत्व की ओर ले जाने वाली एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा है, जो प्रत्येक पाठक को अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित होने के लिए प्रेरित करती है। पुस्तक का केंद्रीय संदेश उपनिषद के अमर महावाक्य “तत् त्वम् असि”—“तुम वही परम सत्य हो”—के इर्द-गिर्द विकसित होता है, जो यह उद्घोष करता है कि प्रत्येक जीव के भीतर वही दिव्य चेतना विद्यमान है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार है।
पुस्तक का आधार ऋषि उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु के मध्य होने वाला वह प्रसिद्ध संवाद है, जिसने हजारों वर्षों से भारतीय दर्शन को दिशा प्रदान की है। प्रारम्भ में श्वेतकेतु स्वयं को अपने ज्ञान पर गर्व करने वाला विद्यार्थी मानता है, किन्तु उसके पिता उससे एक ऐसा प्रश्न पूछते हैं जो उसके समस्त अहंकार को चुनौती देता है—क्या उसने उस सत्य को जाना है जिसे जान लेने पर सब कुछ जाना जा सकता है? यही प्रश्न पूरी पुस्तक की आत्मा बन जाता है और पाठक को बाहरी ज्ञान से आंतरिक अनुभूति की ओर ले जाता है। यह यात्रा केवल श्वेतकेतु की नहीं रहती; धीरे-धीरे यह प्रत्येक पाठक की अपनी यात्रा बन जाती है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी चित्रात्मक प्रस्तुति है। प्रत्येक पृष्ठ पर अत्यंत आकर्षक, भावपूर्ण और कलात्मक चित्र केवल कथा को सजाते नहीं, बल्कि उपनिषद के गहन दार्शनिक सिद्धांतों को दृश्य अनुभव में परिवर्तित कर देते हैं। मिट्टी से बने अनेक घड़ों के माध्यम से यह बताया गया है कि रूप भले ही अनेक हों, परन्तु मूल तत्व एक ही है। स्वर्ण के विविध आभूषण यह स्मरण कराते हैं कि नाम और आकार बदलते रहते हैं, किन्तु सार सदैव एक रहता है। वटवृक्ष के सूक्ष्म बीज, जल में घुला हुआ नमक, अनेक नदियों का समुद्र में मिल जाना तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय में प्रकाशित दिव्य ज्योति जैसे प्रतीक उपनिषद के अमूर्त विचारों को अत्यंत सहज और स्मरणीय बना देते हैं। इन चित्रों के माध्यम से दर्शन केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि अनुभव भी किया जाता है।
यह पुस्तक बार-बार इस सत्य को स्थापित करती है कि हमारी वास्तविक पहचान शरीर, नाम, जाति, भाषा, संस्कृति, पद या उपलब्धियों से कहीं अधिक गहरी है। मनुष्य अपने बाहरी व्यक्तित्व से स्वयं को पहचानने का प्रयास करता है, जबकि उपनिषद उसे अपने भीतर विद्यमान उस चेतना की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है जो सभी में समान रूप से विद्यमान है। जब यह अनुभव जागृत होता है कि प्रत्येक जीव उसी एक परम सत्ता की अभिव्यक्ति है, तब विभाजन, अहंकार, भय और द्वेष स्वतः समाप्त होने लगते हैं। यही अनुभूति करुणा, विनम्रता और वैश्विक बंधुत्व का आधार बनती है।
यद्यपि छान्दोग्य उपनिषद की रचना सहस्रों वर्ष पूर्व हुई थी, उसकी शिक्षाएँ आज के समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती हैं। आज का मनुष्य विज्ञान, तकनीक और सूचना के अभूतपूर्व विस्तार के बीच भी मानसिक अशांति, अकेलेपन और पहचान के संकट से जूझ रहा है। यह पुस्तक बताती है कि बाहरी उपलब्धियाँ जीवन को सुविधा तो दे सकती हैं, किन्तु स्थायी संतोष केवल आत्मबोध से प्राप्त होता है। आधुनिक नगरों, विविध संस्कृतियों और मानव समुदायों के चित्रों के माध्यम से पुस्तक यह संदेश देती है कि भिन्नताओं के बीच भी हमारी मूल मानवता और चेतना एक ही है। यही विचार वर्तमान वैश्विक समाज में शांति, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान की आधारशिला बन सकता है।
पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और सहज है। जटिल संस्कृत दार्शनिक अवधारणाओं को कठिन शास्त्रीय शैली में प्रस्तुत करने के स्थान पर लेखक ने उन्हें छोटी-छोटी कथाओं, जीवन से जुड़े उदाहरणों और प्रभावशाली चित्रों के माध्यम से समझाया है। इससे यह पुस्तक केवल विद्वानों के लिए ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों, युवाओं, परिवारों तथा भारतीय दर्शन में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी बन जाती है। प्रत्येक पृष्ठ एक स्वतंत्र प्रेरणा देता है, जबकि सम्पूर्ण पुस्तक मिलकर आत्मज्ञान की एक निरंतर यात्रा का निर्माण करती है।
छान्दोग्य उपनिषद: एक शाश्वत ज्ञान की दृश्य यात्रा केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि स्वयं को जानने का निमंत्रण है। यह हमें स्मरण कराती है कि जिस सत्य की खोज हम संसार में करते रहते हैं, वह सदैव हमारे अपने भीतर विद्यमान है। जब मनुष्य इस सत्य को पहचान लेता है, तब उसके लिए सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार बन जाती है, प्रत्येक हृदय में वही प्रकाश दिखाई देने लगता है और जीवन भय से नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा, ज्ञान और एकत्व की अनुभूति से संचालित होने लगता है। यही इस पुस्तक का शाश्वत संदेश है, और यही छान्दोग्य उपनिषद की अमर वाणी का वास्तविक सार है।
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