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जाबाल उपनिषद् (eBook)

आत्मज्ञान और मुक्ति की दिव्य यात्रा
Type: e-book
Genre: Philosophy, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹50
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF, EPUB

Description

जाबाल उपनिषद् उपनिषद् साहित्य की उन विशिष्ट कृतियों में से एक है जो साधक को बाहरी आडंबरों से हटाकर उसके अपने अंतरतम की ओर ले जाती हैं। यह ग्रंथ केवल दार्शनिक विचारों का संग्रह नहीं है, बल्कि आत्मबोध, वैराग्य, संन्यास और परम सत्य की खोज का एक जीवंत मार्गदर्शक है। इस पुस्तक में जाबाल उपनिषद् की गूढ़ शिक्षाओं को सरल, सहज और दृश्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, जिससे आधुनिक पाठक भी इसके गहन आध्यात्मिक संदेश को आसानी से समझ सके।

पुस्तक का केंद्रीय विचार यह है कि वास्तविक पवित्रता किसी विशेष स्थान, वस्तु या बाहरी पहचान में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर विद्यमान दिव्य चेतना में निहित है। जाबाल उपनिषद् काशी के आध्यात्मिक महत्व, अविमुक्त क्षेत्र की अवधारणा तथा आत्मा और ब्रह्म के संबंध को एक अद्वितीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। यह हमें स्मरण कराता है कि जिस परम सत्य की खोज हम संसार में करते हैं, वह सदैव हमारे भीतर ही उपस्थित रहता है।

इस पुस्तक की विशेषता इसकी चित्रात्मक प्रस्तुति है। प्रत्येक विचार को आकर्षक और प्रेरणादायक चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है, जिससे पाठक केवल शब्दों को पढ़ता ही नहीं, बल्कि उन्हें अनुभव भी करता है। दृश्य और विचार का यह समन्वय प्राचीन ज्ञान को एक नई जीवंतता प्रदान करता है। पुस्तक का प्रत्येक पृष्ठ पाठक को आत्मचिंतन, अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक जागरण की ओर प्रेरित करता है।

आज के तीव्र गति वाले, तकनीक-प्रधान और निरंतर व्यस्त जीवन में यह पुस्तक एक शांत प्रकाशस्तंभ की भाँति कार्य करती है। यह हमें कुछ क्षण रुककर स्वयं को देखने, अपने भीतर के प्रकाश को पहचानने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करने के लिए आमंत्रित करती है। जाबाल उपनिषद् की शिक्षाएँ केवल संन्यासियों या आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं हैं; वे प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक हैं जो शांति, संतुलन, स्वतंत्रता और आत्मिक संतोष की खोज में है।

डॉ. पार्थ मजुमदार द्वारा लिखित यह पुस्तक प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक प्रस्तुति शैली का सुंदर संगम है। सरल भाषा, प्रेरक चित्रों और कालातीत संदेशों से युक्त यह कृति पाठकों को एक ऐसी आंतरिक यात्रा पर ले जाती है जहाँ ज्ञान केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि अनुभव किया जाता है। यह पुस्तक हमें बताती है कि मुक्ति किसी दूरस्थ लक्ष्य का नाम नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान का अनुभव है। जो पाठक आत्मज्ञान, भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन में रुचि रखते हैं, उनके लिए जाबाल उपनिषद् एक प्रेरणादायक और चिंतनशील पठन अनुभव सिद्ध होगी।

About the Author

डॉ. पार्थ मजुमदार एक प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, रणनीतिकार और लेखक हैं, जिन्हें वैश्विक निगमों, उद्यमशील उपक्रमों तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में तीन दशकों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने कंप्यूटर विज्ञान, व्यवसाय प्रशासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में उच्च स्तरीय शैक्षणिक योग्यताएँ अर्जित की हैं।

सीमेंस, मोबिली, जेपी मॉर्गन चेस जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिकाएँ निभाने के साथ-साथ मजुमदार कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की तकनीकी प्रणालियों के विकास का नेतृत्व किया है। उन्होंने एशिया, मध्य-पूर्व और यूरोप के विभिन्न देशों में सरकारों तथा दूरसंचार क्षेत्र की अग्रणी संस्थाओं को रणनीतिक परामर्श भी प्रदान किया है।

८० से अधिक पुस्तकों और २५ से अधिक शोध-पत्रों के लेखक डॉ. मजुमदार उद्योग और अकादमिक जगत के अनुभवों का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करते हैं। उनकी विशेषज्ञता डेटा विज्ञान, परियोजना प्रबंधन तथा नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रतिष्ठित है। उनका कार्य नवाचार, सांस्कृतिक प्रज्ञा और सतत विकास पर आधारित नेतृत्व की एक ऐसी दृष्टि को प्रतिबिंबित करता है, जो आधुनिक प्रौद्योगिकी को मानवीय मूल्यों और ज्ञान परंपराओं के साथ जोड़ती है।

Book Details

Publisher: Dr Partha Majumdar
Number of Pages: 35
Availability: Available for Download (e-book)

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