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तैत्तिरीय उपनिषद् भारतीय ज्ञान परम्परा के सबसे महत्त्वपूर्ण उपनिषदों में से एक है। यह मनुष्य को केवल एक भौतिक शरीर के रूप में नहीं, बल्कि अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—इन पाँच कोशों से युक्त एक बहुआयामी अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करता है। गुरु और शिष्य के संवाद, गहन आत्मचिन्तन तथा भृगु के सत्य-अन्वेषण के माध्यम से यह उपनिषद् पाठक को बाह्य जगत से आन्तरिक आनन्द और आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।
यह चित्र-पुस्तक तैत्तिरीय उपनिषद् की गूढ़ शिक्षाओं को सरल, सहज और आकर्षक रूप में प्रस्तुत करती है। प्रत्येक पृष्ठ पर सुन्दर चित्रों के साथ संक्षिप्त हिन्दी पाठ दिया गया है, जिससे बालक, युवा और वयस्क सभी पाठक उपनिषद् के मूल विचारों को सहजता से समझ सकें। पुस्तक में ज्ञान, अनुशासन, सत्य, ब्रह्म, पञ्चकोश, आत्म-अन्वेषण और आन्तरिक आनन्द जैसी अवधारणाओं को प्रेरक दृश्य कथाओं के माध्यम से जीवंत बनाया गया है।
यह पुस्तक केवल प्राचीन दर्शन का परिचय नहीं कराती, बल्कि आधुनिक जीवन के सन्दर्भ में भी तैत्तिरीय उपनिषद् की प्रासंगिकता को उजागर करती है। तीव्र गति, निरन्तर विचलनों और सूचना-प्रधान युग में यह हमें स्मरण कराती है कि वास्तविक सुख, शान्ति और ज्ञान बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर विद्यमान हैं। यह पुस्तक पाठकों को आत्मचिन्तन, आन्तरिक विकास और शाश्वत भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।
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