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संसार के बदलते रूपों के पीछे क्या है? प्रकाशमान हंस, प्रकृति के तीन रंगों, फल चखते पक्षी और समुद्र में मिलती नदियों के माध्यम से मान्त्रिक उपनिषद् हमें आत्मा तथा उस शाश्वत सत्य पर चिन्तन करने के लिए आमन्त्रित करता है, जो समस्त अस्तित्व का आधार है।
चित्रों से सजी यह यात्रा एक युवा जिज्ञासु को संसार के प्रति कौतूहल से शान्त आत्मचिन्तन की ओर ले जाती है। वन, पवित्र सभाएँ और विशाल समुद्र इस उपनिषद् के प्रतीकों को सजीव बनाते हैं, जबकि सरल कथाशैली इसके दार्शनिक प्रश्नों को हर आयु के पाठकों के लिए सहज बनाती है।
यह यात्रा आज के जीवन से भी जुड़ती है। यह हमें अपनी इच्छाओं के पीछे भागने से पहले ठहरने, दूसरों के दृष्टिकोण को स्थान देने और उस संसार की देखभाल करने के लिए प्रेरित करती है, जिसमें हम सब रहते हैं। ये सहज विचार, संवाद, चिंतन और खोज के अवसर प्रदान करते हैं।
मानव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहयोग से रचित, डॉ. पार्थ मजूमदार की उपनिषद् चित्रपुस्तक शृंखला की यह कृति पाठकों को अधिक गहराई से देखने, अधिक ध्यान से सुनने और परिचित संसार में भी विस्मय खोजने के लिए आमन्त्रित करती है।
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