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"क्या किसी 'आदर्श' बहू के जीवन में सिर्फ त्याग और समझौता ही लिखा होता है? या उसका भी अपना कोई अस्तित्व होता है? छत्तीसगढ़ी साहित्य की सोंधी खुशबू में रची-बसी, यह कहानी है त्रिवेणी की। वह त्रिवेणी, जिसने एक आदर्श बहू से लेकर 'बेकार' बहू बनने तक के इस दर्द भरे और कड़े संघर्ष के सफर को जिया है।"
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