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कन्या कोई वस्तु नहीं, जिसका दान किया जाए।
एक छोटी बच्ची पहली बार किसी रिश्तेदार के मुँह से सुनती है कि वह “पराया धन” है। बरसों बाद, शादी के मंडप में, वही बात एक रस्म का नाम बनकर लौटती है— कन्यादान।
“कन्यादान?” एक बेटी की कहानी है। उस आँगन से, जहाँ उसका जन्म हुआ, उस मंडप तक, जहाँ उसे ‘दान’ कहा गया, और उसके बाद के उन बरसों तक, जब वह दो घरों के बीच अपनी जगह, अपना नाम और अपनी पहचान ढूँढती रही। मायके में उसका कमरा किसी और का हो जाता है, ससुराल में उसकी नौकरी चुपचाप छूट जाती है, और जिस पहचान को उसने सबके लिए खो दिया था, उसे फिर से पाने के लिए उसे अपने ही भीतर एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
इस पुस्तक में आप पढ़ेंगे—
- एक बेटी के जन्म से लेकर विवाह और उसके बाद तक की भावनात्मक यात्रा
- माँ की ख़ामोश दुआएँ और पिता का अनकहा गर्व
- “चिट्ठियाँ, जो भेजी नहीं गईं”— बेटी, पिता, माँ और परिवार के मन की अनकही बातें
- “कन्या सम्मान” की एक नई सोच, जिसे हर परिवार अपना सकता है
यह पुस्तक किसी पर उँगली नहीं उठाती। यह माता-पिता, बेटियों, बेटों और ससुराल— सबसे बात करती है, और एक सीधा-सा प्रश्न पूछती है: अगर विवाह दो बराबर के लोगों का साथ है, तो उसमें ‘दान’ किसका?
शादी के बाद भी बेटी पर माता-पिता का हक़ ज़रा भी कम नहीं होता।
बेटी का दान नहीं— उसका सम्मान।
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