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कुरुक्षेत्र केवल एक भूमि नहीं, अपितु सृष्टि, आस्था और इतिहास का संगम है — जहाँ लुप्त सरस्वती नदी का रहस्य आज भी शोधार्थियों को आमंत्रित करता है, और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का अमर संदेश दिया। यह 514 पृष्ठों का प्रामाणिक शोधग्रंथ कुरुक्षेत्र की भौगोलिक, पौराणिक तथा आध्यात्मिक विरासत का गहन विवेचन प्रस्तुत करता है — सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सरस्वती सभ्यता तथा महाभारत-कालीन घटनाओं तक।
लेखक नरेश दास वैष्णव निम्बार्क, सेवानिवृत्त मानद नायब सूबेदार (भारतीय सेना, 24 वर्ष सेवा, ऑपरेशन विजय व सिएरा लियोन शांति सेना), विगत 18 वर्षों से सनातन वैष्णव बैरागी परंपरा पर अनुसंधानरत हैं। उन्होंने हिंदी व अंग्रेज़ी में 18 पुस्तकें प्रकाशित की हैं, जो 190 से अधिक देशों में उपलब्ध हैं। यह ग्रंथ प्रमाण-आधारित एवं संतुलित इतिहास-लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतिफल है।
इतिहास, धर्म व आध्यात्म में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए यह पुस्तक अनिवार्य है।
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