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आत्मा, समाज और व्यवस्था राष्ट्र निर्माण पुस्तक श्रृंखला की पाँचवीं पुस्तक है। यह पुस्तक व्यक्ति की आंतरिक चेतना से लेकर परिवार, समाज, राष्ट्र और व्यवस्था तक की यात्रा को समझने का प्रयास करती है।
पुस्तक का मूल विचार है कि समाज और राष्ट्र की व्यवस्था बाहर से अलग-अलग नहीं बनती, बल्कि उसकी जड़ मनुष्य की चेतना, संस्कार, परिवार और सामाजिक व्यवहार में होती है। जब व्यक्ति के भीतर विवेक, सत्य, करुणा और जिम्मेदारी विकसित होती है, तो उसका प्रभाव परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक पहुँचता है।
पुस्तक में परिवार को आत्मा का पहला विद्यालय, संस्कार और स्वतंत्रता को जीवन की दो आवश्यक धाराएँ, अनुभव को आत्म-विकास का माध्यम तथा समाज को सामूहिक चेतना के विस्तार के रूप में देखा गया है। इसके साथ धर्म, परंपरा, सत्ता, नैतिकता, आत्म-शासन और चेतन समाज जैसे विषयों पर भी विचार किया गया है।
यह पुस्तक किसी एक राजनीतिक या धार्मिक व्यवस्था का समर्थन करने के बजाय पाठक को स्वयं विचार करने, प्रश्न पूछने और समाज तथा व्यवस्था को भीतर से समझने के लिए प्रेरित करती है।
इस पुस्तक का केंद्रीय संदेश है—
श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण केवल संसद और व्यवस्था से नहीं, बल्कि चेतन मनुष्य, परिवार और समाज से होता है।
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