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राष्ट्र निर्माण की शिक्षा क्रांति
शिक्षा केवल डिग्री नहीं, जीवन निर्माण है।
आज का संसार तेजी से बदल रहा है। डिजिटल तकनीक, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल बैंकिंग और बदलती सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों ने आने वाली पीढ़ी के सामने नई संभावनाओं के साथ नई चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारी शिक्षा बच्चों को केवल परीक्षा और डिग्री के लिए तैयार कर रही है या वास्तविक जीवन के लिए भी?
"राष्ट्र निर्माण की शिक्षा क्रांति" इसी प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने का एक प्रयास है।
इस पुस्तक में शिक्षा को केवल विद्यालय और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर गर्भ से प्रारम्भ होने वाली और जीवनभर चलने वाली विकास प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। इसमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कमियों, डिग्री और वास्तविक ज्ञान के अंतर, चरित्र निर्माण, जीवन कौशल, डिजिटल शिक्षा, कंप्यूटर एवं AI, वित्तीय और बैंकिंग जागरूकता, नागरिक अधिकार एवं कर्तव्य, उच्च शिक्षा, स्वरोजगार, उद्यमिता, ध्यान और आंतरिक विकास जैसे विषयों पर विचार किया गया है।
पुस्तक का मूल विचार है कि विद्यार्थी को केवल नौकरी पाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर, जागरूक, चरित्रवान, कुशल और जिम्मेदार नागरिक बनाया जाना चाहिए।
एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें बच्चा पढ़ना-लिखना और परीक्षा देना तो सीखे ही, साथ-साथ जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का सामना करना भी सीखे—तकनीक का सही उपयोग, आर्थिक निर्णय, अपने अधिकार और कर्तव्य, समस्या का समाधान, संवाद, आत्मअनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी।
यह पुस्तक शिक्षा को बदलने की आवश्यकता पर केवल प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि एक समग्र और भविष्य उन्मुख शिक्षा व्यवस्था का प्रारूप प्रस्तुत करने का प्रयास भी करती है।
क्योंकि—
जब शिक्षा बदलती है, तो व्यक्ति बदलता है।
व्यक्ति बदलता है, तो परिवार बदलता है।
परिवार बदलता है, तो समाज बदलता है।
और समाज बदलता है, तो राष्ट्र का भविष्य बदलता है।
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