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आध्यात्मिक बाजार और बेचैन मनुष्य (eBook)

Type: e-book
Genre: Politics & Society, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹99
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF, EPUB

Description

प्रस्तावना

यह पुस्तक उस समय की उपज है जिसमें मनुष्य अपनी ही बनाई दुनिया के बीच खड़ा होकर अपने भीतर शांति खोज रहा है। जीवन पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक, अधिक तेज़ और अधिक विकल्पों से भरा दिखाई देता है, फिर भी मन के स्तर पर असंतोष, तनाव और बेचैनी सामान्य अनुभव बन चुके हैं। इस विरोधाभास को समझे बिना न तो आधुनिक मनुष्य को समझा जा सकता है और न ही उस आध्यात्मिक प्रवृत्ति को, जो आज एक व्यापक सांस्कृतिक उपस्थिति बन चुकी है।
आधुनिक जीवन में आध्यात्मिकता केवल व्यक्तिगत साधना या आस्था का विषय नहीं रह गई है; वह एक व्यवस्थित क्षेत्र के रूप में सामने आई है—जहाँ शांति के उपाय, आत्म-सुधार के सूत्र और आंतरिक संतुलन के तरीके बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। इन उपायों का आकर्षण स्वाभाविक है, क्योंकि वे मनुष्य को तत्काल राहत का आश्वासन देते हैं। लेकिन एक बुनियादी प्रश्न बना रहता है: यदि समाधान इतने सुलभ हैं, तो बेचैनी इतनी व्यापक क्यों है?
यह पुस्तक इसी प्रश्न की पड़ताल करती है।
यहाँ यह मानकर चला गया है कि मनुष्य का मानसिक और भावनात्मक अनुभव केवल निजी नहीं होता; वह उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश से गहराई से जुड़ा होता है। मन की स्थिति और जीवन की परिस्थितियाँ एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। इसलिए जब हम शांति, संतोष या आत्मिक संतुलन की बात करते हैं, तो हमें उस परिवेश को भी देखना आवश्यक होता है जिसमें मनुष्य जी रहा है।
इस संदर्भ में आध्यात्मिकता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। एक ओर वह व्यक्ति को स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है, वहीं दूसरी ओर कई बार वह व्यक्ति को उन बाहरी कारणों से दूर भी कर देती है, जो उसकी बेचैनी में योगदान दे रहे होते हैं। जब पीड़ा को केवल व्यक्तिगत अनुभव मान लिया जाता है, तो उसके व्यापक कारणों पर ध्यान कम हो जाता है। धीरे-धीरे यह धारणा बनती है कि समस्या भीतर है और समाधान भी केवल भीतर ही खोजा जाना चाहिए।
यह पुस्तक आध्यात्मिक अभ्यासों या आंतरिक खोज के महत्व को नकारती नहीं है। बल्कि यह इस बात की जांच करती है कि आधुनिक समय में इनका स्वरूप कैसे बदल गया है, और कैसे वे एक ऐसे ढाँचे का हिस्सा बन जाते हैं जहाँ मनुष्य अपने अनुभवों को समझने के बजाय उन्हें जल्दी से शांत करने की कोशिश करने लगता है।
इस चर्चा का उद्देश्य आलोचना करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। यहाँ कठिन शब्दावली या सैद्धांतिक जटिलता से बचते हुए, सरल और स्पष्ट भाषा में यह देखने का प्रयास किया गया है कि आधुनिक मनुष्य की बेचैनी, उसकी जीवन-स्थितियों और आध्यात्मिक खोज के बीच क्या संबंध है।
पाठक इस पुस्तक में पाएंगे कि शांति की खोज केवल एक निजी यात्रा नहीं है। यह उस दुनिया से भी जुड़ी है जिसमें हम काम करते हैं, संबंध बनाते हैं, प्रतिस्पर्धा करते हैं और अपने लिए अर्थ निर्मित करते हैं। जब तक इस व्यापक संदर्भ को नहीं समझा जाता, तब तक मन की स्थिति को पूरी तरह समझ पाना कठिन है।
इस पुस्तक का उद्देश्य तैयार उत्तर देना नहीं है, बल्कि ऐसे प्रश्नों को सामने रखना है जो हमें अपने समय, अपने अनुभव और अपनी खोज को नए दृष्टिकोण से देखने में सहायता कर सकें।
इन्हीं प्रश्नों के साथ यह पुस्तक आरंभ होती है।

About the Author

लेखक परिचयः मयंक जोशी पिछले 16 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उत्तराखंड के प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में कार्य कर चुके हैं। देहरादून, हल्द्वानी और पिथौरागढ़ में पत्रकारिता की है। 2019 में उन्हें उमेश डोभाल स्मृति युवा पत्रकारिता पुरस्कार मिला। सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।

Book Details

Number of Pages: 257
Availability: Available for Download (e-book)

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आध्यात्मिक बाजार और बेचैन मनुष्य

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