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मौन की महागाथाएँ (eBook)

Type: e-book
Genre: Poetry, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹112
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

‘मौन की महागाथाएँ’ भारतीय महाकाव्य-परंपरा की पाँच महत्वपूर्ण स्त्री-पात्रों—कुंती, गांधारी, सीता, तारा और मंदोदरी—के जीवन, संघर्ष, संवेदना, निर्णय और अंतर्द्वंद्व को केंद्र में रखकर रचा गया एक काव्यात्मक संग्रह है। यह पुस्तक इन स्त्रियों को केवल पौराणिक या पारंपरिक पात्रों के रूप में देखने के बजाय उनके भीतर छिपी मानवीय चेतना, प्रश्नों और मौन को समझने का प्रयास करती है।

कुंती के माध्यम से मातृत्व, अपराधबोध, सामाजिक दबाव और दूरदर्शिता के प्रश्न सामने आते हैं। गांधारी की कविताएँ सत्ता, नैतिकता, मातृत्व और मौन की कीमत पर विचार करती हैं। सीता के माध्यम से स्त्री की गरिमा, आत्मसम्मान, त्याग और सत्यनिष्ठा का स्वर उभरता है। तारा में विवेक, राजनीतिक समझ और भावनात्मक बुद्धिमत्ता दिखाई देती है, जबकि मंदोदरी धर्म, करुणा, प्रेम और अहंकार के बीच खड़े विवेकशील अंतर्मन का प्रतिनिधित्व करती हैं।

यह संग्रह अतीत को दोहराने के बजाय उससे वर्तमान के लिए संवाद स्थापित करता है। इन स्त्री-पात्रों के माध्यम से पुस्तक यह देखने का प्रयास करती है कि महान आख्यानों में जिन आवाज़ों को अक्सर संक्षेप में कहा गया, उनके भीतर कितनी विस्तृत और जटिल मानवीय दुनिया मौजूद थी।

‘मौन की महागाथाएँ’ स्त्री-शक्ति का केवल आदर्शीकरण नहीं करती, बल्कि उसके संघर्ष, पीड़ा, असमंजस, कमजोरियों, साहस और नैतिक दृढ़ता को भी स्थान देती है। यहाँ मौन निष्क्रियता नहीं, बल्कि कभी विवशता, कभी प्रतिरोध, कभी आत्मसंवाद और कभी गहरे नैतिक प्रश्न का रूप लेता है।

यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो भारतीय महाकाव्य-परंपरा को एक नए संवेदनात्मक और मानवीय दृष्टिकोण से पढ़ना चाहते हैं—जहाँ कथा के केंद्र में केवल युद्ध, सत्ता और नायक नहीं, बल्कि वे स्त्रियाँ भी हैं जिन्होंने इतिहास और आख्यानों को अपनी मौन उपस्थिति से गहराई दी।

यह अतीत की कथा मात्र नहीं, बल्कि स्त्री, धर्म और मनुष्यता के बीच एक समकालीन संवाद है।

About the Author

रुपेश रंजन समकालीन हिंदी कविता के संवेदनशील और विचारशील कवि हैं। उनकी कविताओं में प्रेम, विरह, प्रकृति, स्त्री-चेतना, मानवीय संबंध, सामाजिक यथार्थ, आत्मसंघर्ष और जीवन-दर्शन जैसे विविध अनुभवों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनके लिए कविता केवल शब्दों और भावनाओं का संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उठने वाले अनकहे प्रश्नों को आवाज़ देने का माध्यम है।

रुपेश रंजन की काव्य-दृष्टि में संवेदना और विचार का संतुलन महत्वपूर्ण है। वे प्रेम को केवल आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि प्रतीक्षा, त्याग, स्मृति, पीड़ा और आत्मीयता के व्यापक अनुभव के रूप में देखते हैं। इसी तरह उनके यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन से संवाद करने वाली शक्ति बनकर उपस्थित होती है।

उनकी कविताओं की एक प्रमुख विशेषता मौन को अभिव्यक्ति में बदलना है। जो भाव अक्सर कहे नहीं जाते—अधूरा प्रेम, भीतर का अकेलापन, स्त्री का मौन, रिश्तों की दूरी, समय का परिवर्तन और मनुष्य का आत्मसंघर्ष—उन्हें वे सरल लेकिन प्रभावशाली काव्यात्मक भाषा में व्यक्त करने का प्रयास करते हैं।

‘मौन की महागाथाएँ’ में उनकी कवि-दृष्टि विशेष रूप से स्त्री के अनुभवों की ओर मुड़ती है। कुंती, गांधारी, सीता, तारा और मंदोदरी के माध्यम से वे पीड़ा, कर्तव्य, प्रेम, विवेक, आत्मसम्मान और नैतिक संघर्ष के उन पक्षों को स्वर देते हैं जो महाकाव्यात्मक कथाओं में अक्सर मौन रह जाते हैं।

रुपेश रंजन की कविता का मूल आग्रह सौंदर्य के साथ सत्य और संवेदना की खोज है। उनकी रचनाएँ पाठक को केवल भावुक करने के बजाय उसे ठहरकर सोचने, महसूस करने और अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती हैं।

एक कवि के रूप में उनकी पहचान उन आवाज़ों को शब्द देने की कोशिश में निहित है, जो बोलना चाहती हैं—पर अक्सर मौन रह जाती हैं।

Book Details

Number of Pages: 409
Availability: Available for Download (e-book)

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मौन की महागाथाएँ

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