You can access the distribution details by navigating to My pre-printed books > Distribution
आधा नहीं, पूरा आसमान
एक मौलिक हिंदी प्रेम उपन्यास | संजय जैन
इंदौर की पहली बारिश में कॉलेज के एक बरामदे में दो अजनबी मिलते हैं। आरव, देवास के पास के एक छोटे-से कस्बे का संवेदनशील युवक, जिसकी माँ ने अपने खर्च काटकर उसे पढ़ने भेजा है। अनन्या, वास्तुकला की छात्रा, जो ऐसी जगहें बनाना चाहती है जहाँ किसी बच्चे का सपना केवल इसलिए छोटा न रह जाए कि उसके पास पैसे कम हैं।
बच्चों के लिए एक अध्ययन केंद्र की साझा परियोजना, सराफा की रोशन रातें, छप्पन दुकान की शामें और महेश्वर में नर्मदा का किनारा—दोस्ती धीरे-धीरे प्रेम में बदलती है। पर जब अनन्या को भोपाल में अपने सपने का बड़ा अवसर मिलता है, तो अधूरी सुनी एक बात और मन का डर आरव से एक गलत फैसला करवा देता है।
दूरी के इस मौसम में दोनों को खुद से मिलना है—अपने काम, अपने परिवार और अपनी गलतियों से। उज्जैन की एक यात्रा से शुरू होकर यह कहानी उस सवाल तक पहुँचती है जो हर रिश्ते का सबसे जरूरी सवाल है: क्या प्रेम में किसी एक को अपना आसमान छोटा करना पड़ता है?
इंदौर, देवास, भोपाल, उज्जैन और महेश्वर की जानी-पहचानी गलियों में बुनी यह कहानी प्रेम, दोस्ती, आत्मसम्मान और बराबरी की साझेदारी का उपन्यास है—जहाँ सच्चा साथ पंख नहीं बाँधता, उड़ने का साहस देता है।
क्योंकि प्रेम में किसी को आधा होने की जरूरत नहीं—दोनों को अपना पूरा आसमान मिलना चाहिए।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book आधा नहीं, पूरा आसमान.