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भक्तांबर स्त्रोत्र हिन्दी अनुवाद के साथ (eBook)

Type: e-book
Genre: Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹0
Available Formats: PDF

Description

### श्री भक्तामर स्तोत्र – संस्कृत पाठ एवं हिन्दी अर्थ

![Bhaktamar Stotra | भक्तामर स्तोत्र (Sanskrit) - Sanatan Dharm](https://images.openai.com/static-rsc-4/MQbz_2WuILVrOEpW3Dz1gmuTTwTycer8la1zb9Eb3kBp9F0FTQcAw3CgL9dSnukrv6h7Y4VP1mWfrv8T9DebUrUV7Dz7qIsSHz4IXyzgWeo9JGC_UIit6TRd5hboMJWgPy6WxvJxMn4S2N-4X7YkeqQQU1sKoh--9S4wKSTkyU_ECCeTXvgNZksx1GXQKVxR?purpose=fullsize)

श्री भक्तामर स्तोत्र दिगम्बर जैन परम्परा का अत्यंत प्रसिद्ध एवं श्रद्धापूर्वक पाठ किया जाने वाला स्तोत्र है। इसकी रचना महान दिगम्बर जैन आचार्य श्री मानतुंगाचार्य जी ने की थी।

### भक्तामर स्तोत्र की रचना की कथा

जैन परम्परा में प्रचलित मान्यता के अनुसार, राजा ने आचार्य मानतुंगाचार्य जी को 48 तालों और जंजीरों में कैद कर दिया था। आचार्य श्री ने भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की भक्ति में भक्तामर स्तोत्र की रचना प्रारम्भ की।

कहा जाता है कि स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक के पाठ के साथ एक-एक ताला खुलता गया और 48वें श्लोक तक पहुँचते-पहुँचते सभी 48 ताले खुल गए तथा आचार्य श्री बंधनमुक्त हो गए।

यह प्रसंग जैन धर्म में भक्ति, श्रद्धा और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।

एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण: यह कथा धार्मिक परम्परा और लोकमान्यता का हिस्सा है। इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में निश्चित नहीं कहा जा सकता। मानतुंगाचार्य जी को ही इस स्तोत्र का रचयिता माना जाता है।

### भक्तामर स्तोत्र की विशेषता

* इसमें 48 संस्कृत श्लोक हैं।

* इसमें प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) की स्तुति की गई है।

* यह स्तोत्र भगवान के अनंत गुणों, वीतरागता, ज्ञान, करुणा और आध्यात्मिक शक्ति का वर्णन करता है।

* दिगम्बर परम्परा में इसके 48 श्लोक प्रचलित हैं। श्वेताम्बर परम्परा में प्रचलित पाठ में 44 श्लोक मिलते हैं। Nidarshana Vedh +1

नीचे दिगम्बर परम्परा के 48 श्लोकों का सरल हिन्दी भावार्थ दिया जा रहा है।

### प्रथम भाग – भगवान की स्तुति और महिमा (श्लोक 1–12)

श्लोक 1 – भावार्थ

हे जिनेन्द्र भगवान! आपके चरणों में देवता और भक्त अपने मस्तक के मुकुटों के रत्नों की चमक से वंदना करते हैं। आपके चरणों की स्तुति पापरूपी अंधकार को मिटाती है। संसार रूपी सागर में डूबते हुए प्राणियों के लिए आपके चरण ही सहारा हैं।

श्लोक 2 – भावार्थ

हे प्रथम जिनेन्द्र भगवान! बड़े-बड़े ज्ञानी देवताओं ने भी आपकी महान स्तुति की है। मैं भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ।

श्लोक 3 – भावार्थ

हे प्रभु! मेरी बुद्धि बहुत छोटी है, फिर भी मैं आपकी स्तुति करने का साहस कर रहा हूँ। यह ऐसा ही है जैसे कोई बालक पानी में चंद्रमा का प्रतिबिंब पकड़ने का प्रयास करे।

श्लोक 4 – भावार्थ

हे गुणों के सागर भगवान! आपके अनंत और चंद्रमा के समान निर्मल गुणों का वर्णन करने में बड़े-बड़े विद्वान और देवता भी समर्थ नहीं हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपनी भुजाओं से उफनते हुए महासागर को पार नहीं कर सकता।

श्लोक 5 – भावार्थ

हे मुनियों के स्वामी! मैं अपनी कमजोरी जानते हुए भी आपकी भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ। जैसे हिरणी अपने बच्चे की रक्षा के लिए शक्तिशाली सिंह के सामने भी पहुँच जाती है।

श्लोक 6 – भावार्थ

हे प्रभु! मेरा ज्ञान बहुत कम है, फिर भी आपकी भक्ति मुझे आपकी स्तुति करने के लिए प्रेरित कर रही है। जैसे वसंत ऋतु में आम की सुंदर कलियों को देखकर कोयल मधुर स्वर में गाने लगती है।

श्लोक 7 – भावार्थ

हे भगवान! आपकी स्तुति करने से जीवों के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे सूर्य के निकलते ही संसार का गहरा अंधकार समाप्त हो जाता है।

श्लोक 8 – भावार्थ

हे नाथ! आपकी महिमा को जानते हुए मैं अपनी अल्प बुद्धि से यह स्तुति आरम्भ कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि आपके प्रभाव से यह स्तुति सज्जन लोगों के मन को आकर्षित करेगी। जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद मोती के समान सुंदर दिखाई देती है।

श्लोक 9 – भावार्थ

हे प्रभु! आपकी पूर्ण स्तुति तो महान है ही, केवल आपकी पवित्र कथा सुनने से भी लोगों के पाप दूर होते हैं। जैसे सूर्य की किरणें कमल को खिलने में सहायता करती हैं।

श्लोक 10 – भावार्थ

हे संसार के आभूषण भगवान! आपके गुणों की स्तुति करने वाले भक्त भी महान बन जाते हैं। जो अपने आश्रितों को अपने समान महान बना दे, उसकी महिमा में आश्चर्य ही क्या!

श्लोक 11 – भावार्थ

हे भगवान! आपके मनमोहक और दिव्य स्वरूप को देखने के बाद आँखों को किसी दूसरी वस्तु में संतोष नहीं मिलता। जैसे अमृत के समान मीठा दूध पीने के बाद कोई समुद्र का खारा पानी क्यों पीना चाहेगा?

श्लोक 12 – भावार्थ

हे भगवान! जिन परमाणुओं से आपका पवित्र और अनुपम स्वरूप निर्मित हुआ है, वे भी संसार में अत्यंत दुर्लभ हैं। आपके समान सुंदर और दिव्य स्वरूप दूसरा कोई नहीं है।

### द्वितीय भाग – भगवान के स्वरूप और गुणों का वर्णन (श्लोक 13–25)

श्लोक 13 – भावार्थ

हे प्रभु! आपका मुख इतना सुंदर है कि देवता, मनुष्य और नाग सभी उसे देखकर मोहित हो जाते हैं। चंद्रमा का मुख भी आपके मुख की सुंदरता के सामने फीका पड़ जाता है।

श्लोक 14 – भावार्थ

हे तीनों लोकों के स्वामी! आपके गुण पूर्णिमा के चंद्रमा के समान निर्मल और उज्ज्वल हैं। जो आपके आश्रय में आते हैं, उनके गुणों को कोई रोक नहीं सकता।

श्लोक 15 – भावार्थ

हे भगवान! स्वर्ग की सुंदर देवांगनाएँ भी आपके मन में तनिक भी विकार उत्पन्न नहीं कर सकीं। यह आपकी अद्भुत वीतरागता और आत्मसंयम का प्रमाण है।

श्लोक 16 – भावार्थ

हे नाथ! आप बिना तेल और बिना धुएँ के जलने वाले दीपक के समान तीनों लोकों को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं। आपका ज्ञान संसार को प्रकाशित करने वाला है।

श्लोक 17 – भावार्थ

हे मुनीन्द्र! आपका ज्ञान सूर्य से भी श्रेष्ठ है। सूर्य अस्त हो जाता है, बादलों से ढक जाता है, लेकिन आपका ज्ञान कभी अस्त नहीं होता और न ही कोई उसे ढक सकता है।

श्लोक 18 – भावार्थ

हे भगवान! आपका मुख कमल के समान है, जो मोह और अज्ञान के अंधकार को मिटाता है। वह चंद्रमा के समान संसार को प्रकाश देता है।

श्लोक 19 – भावार्थ

हे नाथ! जब आपके मुख का ज्ञानरूपी प्रकाश संसार का अंधकार मिटा देता है, तब चंद्रमा और सूर्य की भी क्या आवश्यकता रह जाती है? जैसे अच्छी फसल होने पर बादलों की आवश्यकता कम हो जाती है।

श्लोक 20 – भावार्थ

हे भगवान! जैसा अनंत और निर्मल ज्ञान आपमें प्रकाशित होता है, वैसा अन्य किसी में नहीं। जैसे चमकता हुआ रत्न काँच के टुकड़े से अधिक मूल्यवान होता है।

श्लोक 21 – भावार्थ

हे नाथ! संसार के अनेक महान व्यक्तियों को देखने के बाद भी मन को सच्चा संतोष आपके दर्शन से ही मिलता है। आपका स्वरूप ऐसा है कि अगले जन्म में भी मन आपको ही देखना चाहेगा।

श्लोक 22 – भावार्थ

संसार में अनेक माताएँ अनेक पुत्रों को जन्म देती हैं, लेकिन आपके समान महान पुत्र को जन्म देने वाली माता दुर्लभ है। जैसे सभी दिशाओं में तारे होते हैं, लेकिन सूर्य का उदय केवल पूर्व दिशा से होता है।

श्लोक 23 – भावार्थ

हे प्रभु! मुनिजन आपको परम पवित्र, सूर्य के समान तेजस्वी और अज्ञान के अंधकार से परे मानते हैं। आपके सच्चे स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके ही जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।

श्लोक 24 – भावार्थ

हे भगवान! आप अविनाशी, अनंत, असीम, अचिंत्य और निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं। आप योगियों के आराध्य और आत्मज्ञान के सर्वोच्च आदर्श हैं।

श्लोक 25 – भावार्थ

हे भगवान! आप सच्चे ज्ञान के स्वरूप हैं, संसार के कल्याण का मार्ग दिखाने वाले हैं और मोक्षमार्ग के उपदेशक हैं। आप ही सच्चे पुरुषोत्तम हैं।

### तृतीय भाग – भगवान की वंदना और दिव्य महिमा (श्लोक 26–37)

श्लोक 26 – भावार्थ

हे नाथ! आपको बार-बार नमस्कार है, जो तीनों लोकों के दुखों को दूर करने वाले हैं। आप पृथ्वी के पवित्र आभूषण हैं। आप संसार-सागर से पार उतरने का मार्ग दिखाते हैं।

श्लोक 27 – भावार्थ

हे मुनीश्वर! आपके भीतर अनंत सद्गुणों का वास है और दोषों के लिए कोई स्थान नहीं है। आपके गुणों के सामने सभी बुराइयाँ समाप्त हो जाती हैं।

श्लोक 28 – भावार्थ

हे भगवान! अशोक वृक्ष के नीचे आपका पवित्र स्वरूप अत्यंत तेजस्वी दिखाई देता है। जैसे बादलों के बीच से निकलता हुआ सूर्य अंधकार को मिटा देता है।

श्लोक 29 – भावार्थ

हे प्रभु! मणियों से सुशोभित सिंहासन पर विराजमान आपका स्वर्ण के समान दिव्य शरीर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे उदयाचल पर्वत पर सूर्य चमक रहा हो।

श्लोक 30 – भावार्थ

हे जिनेन्द्र! श्वेत चँवरों से सुशोभित आपका स्वर्णिम शरीर अत्यंत मनोहारी है। आपका दिव्य स्वरूप पर्वतराज सुमेरु की स्वर्णिम आभा के समान दिखाई देता है।

श्लोक 31 – भावार्थ

हे भगवान! आपके ऊपर सुशोभित तीन छत्र आपकी तीनों लोकों में सर्वोच्च महिमा और सम्मान को प्रकट करते हैं। उनकी शोभा चंद्रमा के समान निर्मल है।

श्लोक 32 – भावार्थ

हे प्रभु! आकाश में बजने वाले दिव्य नगाड़े आपके यश का गुणगान करते हैं। उनकी गंभीर ध्वनि तीनों लोकों में धर्म और मंगल का संदेश फैलाती है।

श्लोक 33 – भावार्थ

हे भगवान! स्वर्ग से मंदार, पारिजात और अन्य दिव्य पुष्पों की वर्षा होती है। सुगंधित जल की बूँदों से युक्त शीतल हवा आपके गुणगान को और भी पवित्र बनाती है।

श्लोक 34 – भावार्थ

हे प्रभु! आपके शरीर से निकलने वाला दिव्य प्रकाश इतना तेजस्वी है कि तीनों लोकों के अन्य सभी प्रकाश फीके पड़ जाते हैं। आपका तेज सूर्य और चंद्रमा से भी अधिक प्रभावशाली है।

श्लोक 35 – भावार्थ

हे भगवान! आपकी दिव्य वाणी समस्त प्राणियों को उनकी अपनी-अपनी भाषा में समझ में आती है। उसमें स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग तथा सच्चे धर्म का ज्ञान समाहित है।

श्लोक 36 – भावार्थ

हे जिनेन्द्र! आपके चरण नए खिले हुए स्वर्णिम कमलों के समान सुंदर हैं। जहाँ-जहाँ आपके चरण पड़ते हैं, देवता वहाँ कमल की कल्पना करते हैं।

श्लोक 37 – भावार्थ

हे प्रभु! धर्म का उपदेश देने की आपकी महिमा अद्वितीय है। जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार को दूर करता है, वैसे ही आपका ज्ञान संसार के अज्ञान को मिटाता है।

### चतुर्थ भाग – संकटों से रक्षा और स्तोत्र की महिमा (श्लोक 38–48)

श्लोक 38 – भावार्थ

हे भगवान! आपके भक्त उस विशाल और क्रोधित हाथी को देखकर भी भयभीत नहीं होते, जो मद से चूर होकर उनकी ओर दौड़ता हुआ आता है। आपकी भक्ति उन्हें निर्भय बनाती है।

श्लोक 39 – भावार्थ

हे प्रभु! आपके चरणों की शरण लेने वाले भक्तों पर सिंह भी आक्रमण नहीं करता। वे हिंसक पशुओं के भय से मुक्त रहते हैं।

श्लोक 40 – भावार्थ

हे भगवान! जब भयंकर जंगल की आग पूरे संसार को जलाने के लिए आगे बढ़ती हुई प्रतीत होती है, तब आपका पवित्र नाम उस आग को शांत करने वाले जल के समान है।

श्लोक 41 – भावार्थ

हे प्रभु! जिसके हृदय में आपका नामरूपी औषधि विद्यमान है, वह भयंकर और क्रोधित विषधर सर्प से भी भयभीत नहीं होता।

श्लोक 42 – भावार्थ

हे भगवान! युद्धभूमि में शक्तिशाली राजाओं की विशाल सेना, हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की दौड़ से उत्पन्न भय भी आपके स्मरण से उसी प्रकार मिट जाता है, जैसे सूर्य निकलने पर अंधकार मिट जाता है।

श्लोक 43 – भावार्थ

हे जिनेन्द्र! भयंकर युद्ध में, जहाँ हाथियों और योद्धाओं के रक्त की नदियाँ बह रही हों, वहाँ भी आपके चरणकमलों की शरण लेने वाले भक्त विजय प्राप्त करते हैं।

श्लोक 44 – भावार्थ

हे भगवान! समुद्र में उठती विशाल लहरों, भयंकर मगरमच्छों और जल के भीतर की अग्नि से घिरे हुए यात्री भी आपका स्मरण करके भयमुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 45 – भावार्थ

हे प्रभु! जो मनुष्य भयंकर रोग और कष्ट से पीड़ित होकर निराश हो जाते हैं, वे आपके चरणकमलों की पवित्र रज का स्मरण करके नई आशा और शक्ति प्राप्त करते हैं।

श्लोक 46 – भावार्थ

हे भगवान! जो मनुष्य सिर से पैर तक भारी जंजीरों में जकड़े हुए हैं, वे भी आपके नाम का निरंतर स्मरण करके बंधन और भय से मुक्त होने का आत्मबल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 47 – भावार्थ

हे प्रभु! जो बुद्धिमान व्यक्ति आपकी इस पवित्र स्तुति का श्रद्धापूर्वक अध्ययन और पाठ करता है, उसका हाथी, सिंह, जंगल की आग, सर्प, युद्ध, समुद्र और बंधन जैसे संकटों का भय दूर होता है।

श्लोक 48 – भावार्थ

हे जिनेन्द्र भगवान! आचार्य मानतुंग ने आपके अनंत गुणों रूपी सुंदर और विविध रंगों के पुष्पों से इस स्तुति की माला तैयार की है। जो व्यक्ति इस भक्तामर स्तोत्र को सदैव अपने कंठ में धारण करता है अर्थात श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसके जीवन में लक्ष्मी अर्थात समृद्धि और शुभता स्वयं आती है।

### भक्तामर स्तोत्र की कथा में मांगीतुंगी का संदर्भ

आपने मांगीतुंगी का उल्लेख किया है। प्रचलित जैन कथाओं में 48 तालों में बंद किए जाने की घटना सामान्यतः धारा नगरी के राजा भोज से जोड़ी जाती है। कुछ कथाओं में राजा के नाम और घटना के विवरण अलग-अलग मिलते हैं। मांगीतुंगी का संबंध आचार्य मानतुंग जी की आध्यात्मिक स्मृतियों से भी जोड़ा जाता है, लेकिन 48 तालों वाली घटना वहीं हुई थी, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। BHAKTAMAR STROT.docx +2

### मेरी एक विशेष बात

भक्तामर स्तोत्र का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश केवल चमत्कार नहीं है। इसका मूल संदेश है:

* वीतरागता और आत्मशुद्धि।

* अहंकार और क्रोध का त्याग।

* सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।

* भगवान के गुणों का स्मरण और आत्मकल्याण।

णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्व साहूणं।

सभी जीवों का कल्याण हो।

Book Details

Number of Pages: 49
Availability: Available for Download (e-book)

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