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यह पुस्तक किसी धर्म या आस्था पर प्रहार नहीं करती, बल्कि धर्म के नाम पर पनप रहे अधर्म पर एक निर्भीक और विचारोत्तेजक कुठाराघात है। लेखक का विश्वास है कि सच्ची आस्था मनुष्य को जोड़ती है, जबकि स्वार्थ से उपजा अधर्म समाज को बाँटता है।
प्रस्तुत उपन्यास “अंधभक्ति” उनकी दूसरी प्रकाशित पुस्तक है। यह कृति आस्था और अंधविश्वास के बीच की महीन रेखा को पहचानने का साहसिक प्रयास है। लेखक ने अत्यंत संतुलित, शोधपरक और संवेदनशील शैली में धार्मिक स्थलों के नाम पर भूमि-अतिक्रमण, आस्था के व्यावसायीकरण तथा सामाजिक शोषण जैसी प्रवृत्तियों को बेनकाब करते हुए पाठकों के सामने एक गंभीर प्रश्न रखा है क्या धर्म जोड़ने का माध्यम है, या उसे स्वार्थ के लिए प्रयोग किया जा रहा है?
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