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अंधभक्ति
एक सत्य घटना से प्रेरित सामाजिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास
क्या भगवान सचमुच धरती फोड़कर प्रकट हुए थे… या उन्हें उगाया गया था?
मैथिल टोला की एक शांत रात में एक ऐसा षड्यंत्र जन्म लेता है, जो अगले ही दिन पूरे मोहल्ले की आस्था को चमत्कार में बदल देता है। एक साधारण-सी खाली ज़मीन पर अचानक प्रकट हुआ शिवलिंग देखते ही देखते हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन जाता है। प्रश्न पूछने वालों की आवाज़ भीड़ के जयघोष में दब जाती है और सत्य धीरे-धीरे अंधभक्ति के नीचे दबने लगता है।
इस उपन्यास का केंद्र किसी धर्म, देवी-देवता या आस्था का विरोध नहीं है, बल्कि वह क्षण है जब धर्म के नाम पर अधर्म, आस्था के नाम पर छल और भीड़ के नाम पर न्याय को कुचल दिया जाता है।
कहानी के केंद्र में हैं हरदेव मिश्र, जो एक धार्मिक व्यक्ति से महत्वाकांक्षा के कैदी बन जाते हैं; चन्दर बाबू, एक ईमानदार सरकारी कर्मचारी जिसकी जीवनभर की कमाई और बेटी के भविष्य का सपना एक षड्यंत्र की भेंट चढ़ने लगता है; शंभुनाथ झा, जिनकी विवेकपूर्ण आस्था भीड़ के उन्माद के सामने अकेली पड़ जाती है; और शुभांकर तथा नंदिनी, जिनका प्रेम सत्य, परिवार, जाति और नैतिकता के कठिन प्रश्नों के बीच अपनी राह खोजता है।
‘अंधभक्ति’ केवल एक भूमि-विवाद की कहानी नहीं है। यह उस समाज का आईना है जहाँ अफ़वाहें प्रमाण से तेज़ दौड़ती हैं, जहाँ भीड़ कभी-कभी न्यायालय से पहले फैसला सुना देती है, और जहाँ धर्म तथा धर्म के नाम पर होने वाले अधर्म के बीच की महीन रेखा धुंधली होने लगती है।
यह उपन्यास पाठक से कोई निष्कर्ष स्वीकार करने की अपेक्षा नहीं करता। यह केवल कुछ असहज प्रश्न पूछता है
• क्या भगवान के नाम पर किसी मनुष्य का अधिकार छीना जा सकता है?
• क्या आस्था कभी न्याय से बड़ी हो सकती है?
• क्या मौन रहना भी अन्याय में भागीदारी है?
• और क्या प्रेम मनुष्य को सत्य के पक्ष में खड़ा होने का साहस दे सकता है?
भावनात्मक, विचारोत्तेजक और गहन सामाजिक सरोकारों से युक्त ‘अंधभक्ति’ आस्था, विवेक, प्रेम, नैतिकता और मानवीय गरिमा के बीच चलने वाले संघर्ष की ऐसी कथा है, जो पाठक को अंत तक बाँधे रखती है और पुस्तक समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक उसके मन में प्रश्न छोड़ जाती है।
यह उपन्यास किसी धर्म या आस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले अन्याय, छल, कट्टरता और अंधविश्वास के विरुद्ध एक साहित्यिक हस्तक्षेप है।
यदि आपको विचारोत्तेजक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपन्यास पसंद हैं, तो ‘अंधभक्ति’ आपके लिए एक अविस्मरणीय पाठकीय अनुभव सिद्ध होगा।
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