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अंधभक्ति (eBook)

महादेव सच्ची भक्ति से मिलते हैं अंधभक्ति से नहीं
Type: e-book
Genre: Literature & Fiction, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹46
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

अंधभक्ति
एक सत्य घटना से प्रेरित सामाजिक मनोवैज्ञानिक उपन्यास
क्या भगवान सचमुच धरती फोड़कर प्रकट हुए थे… या उन्हें उगाया गया था?
मैथिल टोला की एक शांत रात में एक ऐसा षड्यंत्र जन्म लेता है, जो अगले ही दिन पूरे मोहल्ले की आस्था को चमत्कार में बदल देता है। एक साधारण-सी खाली ज़मीन पर अचानक प्रकट हुआ शिवलिंग देखते ही देखते हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन जाता है। प्रश्न पूछने वालों की आवाज़ भीड़ के जयघोष में दब जाती है और सत्य धीरे-धीरे अंधभक्ति के नीचे दबने लगता है।
इस उपन्यास का केंद्र किसी धर्म, देवी-देवता या आस्था का विरोध नहीं है, बल्कि वह क्षण है जब धर्म के नाम पर अधर्म, आस्था के नाम पर छल और भीड़ के नाम पर न्याय को कुचल दिया जाता है।
कहानी के केंद्र में हैं हरदेव मिश्र, जो एक धार्मिक व्यक्ति से महत्वाकांक्षा के कैदी बन जाते हैं; चन्दर बाबू, एक ईमानदार सरकारी कर्मचारी जिसकी जीवनभर की कमाई और बेटी के भविष्य का सपना एक षड्यंत्र की भेंट चढ़ने लगता है; शंभुनाथ झा, जिनकी विवेकपूर्ण आस्था भीड़ के उन्माद के सामने अकेली पड़ जाती है; और शुभांकर तथा नंदिनी, जिनका प्रेम सत्य, परिवार, जाति और नैतिकता के कठिन प्रश्नों के बीच अपनी राह खोजता है।
‘अंधभक्ति’ केवल एक भूमि-विवाद की कहानी नहीं है। यह उस समाज का आईना है जहाँ अफ़वाहें प्रमाण से तेज़ दौड़ती हैं, जहाँ भीड़ कभी-कभी न्यायालय से पहले फैसला सुना देती है, और जहाँ धर्म तथा धर्म के नाम पर होने वाले अधर्म के बीच की महीन रेखा धुंधली होने लगती है।
यह उपन्यास पाठक से कोई निष्कर्ष स्वीकार करने की अपेक्षा नहीं करता। यह केवल कुछ असहज प्रश्न पूछता है
• क्या भगवान के नाम पर किसी मनुष्य का अधिकार छीना जा सकता है?
• क्या आस्था कभी न्याय से बड़ी हो सकती है?
• क्या मौन रहना भी अन्याय में भागीदारी है?
• और क्या प्रेम मनुष्य को सत्य के पक्ष में खड़ा होने का साहस दे सकता है?
भावनात्मक, विचारोत्तेजक और गहन सामाजिक सरोकारों से युक्त ‘अंधभक्ति’ आस्था, विवेक, प्रेम, नैतिकता और मानवीय गरिमा के बीच चलने वाले संघर्ष की ऐसी कथा है, जो पाठक को अंत तक बाँधे रखती है और पुस्तक समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक उसके मन में प्रश्न छोड़ जाती है।
यह उपन्यास किसी धर्म या आस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले अन्याय, छल, कट्टरता और अंधविश्वास के विरुद्ध एक साहित्यिक हस्तक्षेप है।
यदि आपको विचारोत्तेजक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपन्यास पसंद हैं, तो ‘अंधभक्ति’ आपके लिए एक अविस्मरणीय पाठकीय अनुभव सिद्ध होगा।

About the Author

स्वर्ण कुमार सिंह एक Finance Professional, लेखक और कवि हैं। उन्होंने Delhi University से B.Com की शिक्षा प्राप्त की तथा Semi Qualified Chartered Accountant हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने AAFT (Asian Academy of Film & Television) से Film Script Writing का व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

व्यावसायिक जीवन में वित्तीय क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद उनकी संवेदनाएँ समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रश्नों से गहराई से जुड़ी हैं। वे कविता, कहानी, गीत और लघु उपन्यास के माध्यम से उन विषयों को स्वर देते हैं जिन पर अक्सर समाज मौन रह जाता है। उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विचारों को झकझोरना और पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है।

उनके द्वारा लिखित कविता-संग्रह "हमें और मत बाँटो" पाठकों द्वारा बहुत सराहा गया। प्रस्तुत उपन्यास "अंधभक्ति" उनकी दूसरी प्रकाशित पुस्तक है। यह कृति आस्था और अंधविश्वास के बीच की महीन रेखा को पहचानने का साहसिक प्रयास है। लेखक ने अत्यंत संतुलित, शोधपरक और संवेदनशील शैली में धार्मिक स्थलों के नाम पर भूमि-अतिक्रमण, आस्था के व्यावसायीकरण तथा सामाजिक शोषण जैसी प्रवृत्तियों को बेनकाब करते हुए पाठकों के सामने एक गंभीर प्रश्न रखा है क्या धर्म जोड़ने का माध्यम है, या उसे स्वार्थ के लिए प्रयोग किया जा रहा है?

यह पुस्तक किसी धर्म या आस्था पर प्रहार नहीं करती, बल्कि धर्म के नाम पर पनप रहे अधर्म पर एक निर्भीक और विचारोत्तेजक कुठाराघात है। लेखक का विश्वास है कि सच्ची आस्था मनुष्य को जोड़ती है, जबकि स्वार्थ से उपजा अधर्म समाज को बाँटता है।

Book Details

ISBN: 9789359338774
Publisher: स्वर्ण कुमार सिंह
Number of Pages: 251
Availability: Available for Download (e-book)

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