You can access the distribution details by navigating to My pre-printed books > Distribution
कविता तब जन्म लेती है, जब समाज बोलना भूल जाता है, और कवि वह कह देता है, जो हम सब महसूस तो करते हैं, पर स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते।
“हमें और मत बाँटो” केवल एक कविता-संग्रह नहीं है; यह हमारे समय का आईना है। एक ऐसा आईना, जिसमें हम अपना चेहरा देखना तो चाहते हैं, पर सच दिख जाने के डर से नज़रें चुरा भी लेते हैं।
इस संग्रह की कविताएँ किसी एक विषय तक सीमित नहीं हैं। ये मनुष्य के टूटते रिश्तों, बिखरते गाँवों, खोते बचपन, कमज़ोर होते भाईचारे, तथा धर्म, सत्ता और स्वार्थ के गठजोड़ से उपजी दरारों के संवेदनशील दस्तावेज़ हैं।
“गाँव का सूनापन” हमें पूछने पर मजबूर करता है, विकास की इस दौड़ में आखिर लोग कहाँ खो गए? “विधवा माँ” और “मेरा बचपन” उस पीड़ा को स्वर देते हैं, जो आँकड़ों में कभी दर्ज नहीं होती। “धर्म का धंधा” और “ये कैसा भाईचारा है” हमारे समय के सबसे असहज प्रश्नों को पूरी ईमानदारी से हमारे सामने रख देते हैं।
इन कविताओं की सबसे बड़ी ताक़त इनकी सरलता है। यह सरलता कमज़ोरी नहीं, बल्कि गहराई की पहचान है। यह वही भाषा है, जो आम आदमी की साँसों में बसती है जो सड़क, खेत, गली और घर की देहरी से उठती है।
लेखक न तो उपदेश देता है, न ही किसी विचारधारा का शोर मचाता है। वह बस मनुष्य को मनुष्य बने रहने की एक विनम्र प्रार्थना करता है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book हमें और मत बाँटो.