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जिस दिन भगवान मर गया (eBook)

विश्वास से विवेक तक की यात्रा
Type: e-book
Genre: Literature & Fiction, Philosophy
Language: Hindi
Price: ₹99
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

जिस दिन भगवान मर गया (विश्वास से विवेक तक की यात्रा)

क्या भगवान सचमुच मर सकता है ? यह प्रश्न जितना असहज है, उतना ही गहरा भी। “जिस दिन भगवान मर गया” किसी धर्म, आस्था या ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध लिखी गई कहानी नहीं, बल्कि उस मानसिकता की पड़ताल है जिसमें मनुष्य अपने प्रश्नों, भय, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के बीच अपने विवेक को खो देता है। यह पुस्तक एक ऐसी वैचारिक यात्रा है, जिसमें विश्वास से प्रश्न तक, प्रश्न से तर्क तक और तर्क से विवेक तक पहुँचने की कोशिश की गई है। इसमें ईश्वर, धर्म, आस्था, समाज, राजनीति, मानवीय संवेदना और नैतिकता जैसे विषयों को एक मानवीय और प्रश्नाकुल दृष्टि से देखा गया है।
जब आस्था मनुष्य को सहारा देती है, तो वह शक्ति बनती है; लेकिन जब वही आस्था प्रश्न पूछने से रोक देती है, भय पैदा करती है या मनुष्य को मनुष्य से बाँटने लगती है, तब एक नया प्रश्न जन्म लेता है—क्या हमें ईश्वर को खोजने से पहले अपने भीतर के मनुष्य को नहीं खोजना चाहिए ?
यह उपन्यास पाठक को किसी निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसके बजाय वह उसे अपने भीतर झाँकने, सवाल पूछने और स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है। “जिस दिन भगवान मर गया” दरअसल भगवान की मृत्यु की कहानी नहीं, बल्कि अंधविश्वास की मृत्यु और विवेक के जन्म की कहानी है। एक ऐसी यात्रा, जहाँ मंज़िल कोई अंतिम जवाब नहीं अपितु प्रश्न पूछने का साहस है।

About the Author

नवल किशोर सोनी शिक्षा एवं सामाजिक विकास के क्षेत्र में लगभग तीन दशकों से सक्रिय हैं। शिक्षा, समाज और मानवीय व्यवहार को करीब से देखने और समझने के लंबे अनुभव ने उनके लेखन को जीवन के वास्तविक प्रश्नों से जोड़ा है। उनका मानना है कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं से और अपने समय से संवाद करने का अवसर भी देता है। लेखन में उनकी विशेष रुचि उन प्रश्नों को उठाने में है, जिनके जवाब मनुष्य अक्सर परंपरा, विश्वास और सामाजिक धारणाओं के बीच खोजता है। वे तर्क, मानवीय संवेदना और स्वतंत्र चिंतन को जीवन के महत्वपूर्ण आधार मानते हैं।

“जिस दिन भगवान मर गया” इसी वैचारिक यात्रा का परिणाम है। यह उपन्यास किसी आस्था को खारिज करने का प्रयास मात्र नहीं, अपितु एक बुनियादी प्रश्न के माध्यम से मनुष्य, नैतिकता, भय, विश्वास और जिम्मेदारी को समझने की कोशिश है। क्या अच्छा मनुष्य बनने के लिए किसी अदृश्य सत्ता की आवश्यकता है ? लेखक पाठक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उसे सोचने, प्रश्न करने और अपने भीतर जवाब तलाशने के लिए आमंत्रित करते हैं। यही इस उपन्यास और उनके लेखन की मूल संवेदना है।

Book Details

Publisher: Naval Kishor Soni
Number of Pages: 192
Availability: Available for Download (e-book)

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