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एक अधूरा सपना, एक अनकही दास्तां और एक ऐसा प्यार जिसे वक्त भी न मिटा सका।
सन् 1998 का प्रयागराज, कड़ाके की ठंड और कोहरे में लिपटी शहर की गलियां। 'काँच का ख़्वाब' महज़ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह रूह की तलाश और उन वादों की कहानी है जो कभी पूरे न हो सके।
कैलाश, जो अपने पिता के सपनों को पूरा करने इलाहाबाद आता है, उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि यहाँ की आबोहवा में उसे राधा मिलेगी—एक ऐसी शख्सियत जो उसकी खामोश शायरी को आवाज़ दे देगी। 'हमसफर कैफ़े' की मुलाकातों से लेकर संगम की लहरों के बीच गूंजती गालिब की शायरी तक, सब कुछ किसी हकीकत से सुंदर ख़्वाब जैसा था।
लेकिन क्या होता है जब समाज की मर्यादा और लोक-लाज की दीवारें इस "काँच के ख़्वाब" को चकनाचूर करने पर आमादा हो जाती हैं?
• क्या कैलाश और राधा का मौन संवाद हकीकत की कड़वाहट को मात दे पाएगा?
• क्या बिछड़ना ही मोहब्बत की आखिरी मंज़िल है?
• क्या एक अधूरा ख़्वाब किसी इंसान को ज़िंदा लाश बना सकता है?
अपनी 5वीं पुस्तक में लेखक अर्जुन मौर्य ने भावनाओं के उस समंदर को उकेरा है जहाँ हर मुसाफिर को अपना ही अक्स नज़र आएगा।
आइए, 1998 के उस दौर में लौटें जहाँ प्यार सिर्फ़ हासिल करना नहीं, बल्कि एक रूहानी इबादत थी।
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