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रात के दो बजे हैं। पचास साल के रमेश जी की नींद खुलती है। छाती के बीच में एक भारीपन है — जैसे किसी ने ऊपर पत्थर रख दिया हो। वे उठकर बैठ जाते हैं। पत्नी पूछती है, "क्या हुआ?" रमेश जी कहते हैं, "कुछ नहीं, गैस बन गई होगी। रात को पूड़ी खा ली थी।"
वे एक ईनो घोलकर पी लेते हैं। थोड़ी देर बाद डकार आती है और लगता है कुछ आराम मिला। वे फिर सो जाते हैं।
सुबह छह बजे उन्हें अस्पताल लाया जाता है। ECG में दिखता है कि दिल का एक बड़ा हिस्सा पहले ही खराब हो चुका है। हम उनकी जान तो बचा लेते हैं, पर उनका दिल अब पहले जैसा कभी नहीं होगा।
अब दूसरी कहानी सुनिए।
अड़तीस साल की सुनीता जी को पिछले छह महीनों से बार-बार सीने में दर्द उठता है। वे तीन बार इमरजेंसी जा चुकी हैं। हर बार ECG सामान्य आता है, खून की जाँच सामान्य आती है। उन्होंने दो बार एंजियोग्राफी तक करवा ली — दिल की नसें बिल्कुल साफ़ हैं। फिर भी दर्द आता है। अब वे घर से निकलना बंद कर चुकी हैं, नौकरी छोड़ चुकी हैं, और हर वक्त इस डर में जीती हैं कि कहीं अगला दर्द आखिरी न हो।
रमेश जी को समय पर डर लगना चाहिए था, पर नहीं लगा। सुनीता जी को इतना डर नहीं लगना चाहिए था, पर लग गया।
यह पुस्तक इसी बीच की जगह के बारे में है।
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Be the first one to write a review for the book सीने में दर्द गैस है या हार्ट अटैक? — घबराने से पहले यह पढ़ें.