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यह पुस्तक तकनीक के विरोध में नहीं लिखी गई है।
यह मनुष्य के बदलते हुए व्यवहार को समझने का एक प्रयास है।
व्हाट्सऐप समूह, स्टेटस, ब्लू टिक, “टाइपिंग…”, “लास्ट सीन”, ऑनलाइन उपस्थिति — ये केवल डिजिटल सुविधाएँ नहीं रहीं। धीरे-धीरे ये आधुनिक मनुष्य की भावनात्मक भाषा बन गई हैं।
मैंने वर्षों तक लोगों को समूहों में देखा है — कुछ हमेशा बोलते रहते हैं, कुछ केवल देखते रहते हैं, कुछ प्रतिक्रिया न मिलने पर टूट जाते हैं, कुछ स्टेटस के माध्यम से चुपचाप संवाद करते हैं, कुछ मज़ाक के भीतर आक्रमण छिपाते हैं, और कुछ लोग पूरी दुनिया से जुड़े हुए दिखाई देते हुए भी भीतर से अकेले रहते हैं।
यह पुस्तक उन्हीं व्यवहारों का मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ है।
यहाँ लिखे गए पात्र किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं हैं। वे आधुनिक डिजिटल समाज के सामूहिक चेहरे हैं।
यदि इस पुस्तक को पढ़ते हुए आपको बार-बार लगे कि — “मैंने यह व्यवहार कहीं देखा है…” तो शायद यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता होगी।
— डॉ. प्रदीप साहू
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