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सदा ए लब्बैक (eBook)

हज सफरनामा
Type: e-book
Genre: Religion & Spirituality, Travel
Language: Hindi, Urdu
Price: ₹100
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

आध्यात्मिक जागृति (Spiritual Awakening): लेखक का मानना है कि हज महज़ एक शारीरिक यात्रा नहीं, बल्कि रूह को पाक-साफ़ करने का जरिया है। लेकिन यह पाकीज़गी तभी संभव है जब इंसान 'हुकूक-उल-इबाद' (इंसानों के अधिकार) को पूरा करे। दूसरों का हक मारकर, चाहे वह विरासत हो या व्यापार, किया गया हज बेअसर है।
यह किताब हज के उन पहलुओं पर रोशनी डालती है जो अक्सर भीड़ और रस्मों के शोर में दब जाते हैं। लेखक का मानना है कि हज केवल काबा के चक्कर लगाने या मीना के तंबुओं में दिन गुजारने का नाम नहीं है, बल्कि यह स्वयं को पहचानने और सुधारने की एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा है।
आध्यात्मिकता बनाम औपचारिकता: इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक होने के नाते, हज केवल आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम लोगों पर ही अनिवार्य है। लेखक का मुख्य ज़ोर हज के बाहरी अरकान (नियमों) के बजाय इसके आंतरिक और आध्यात्मिक (Spiritual) प्रभाव पर है।

भ्रम और वास्तविकता: मुस्लिम समाज में यह आम धारणा है कि हज से लौटकर इंसान नवजात शिशु की तरह मासूम और निष्पाप हो जाता है। लेखक इस सोच को चुनौती देते हुए कहते हैं कि अल्लाह की माफ़ी और समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियों में गहरा अंतर है।
हुकूक-उल-इबाद (बन्दों के अधिकार): लेखक कड़े शब्दों में स्पष्ट करते हैं कि यदि किसी ने जीवन भर बेईमानी की है—चाहे वह बहन का विरासत में हिस्सा मारना हो, व्यापारिक साझेदार को धोखा देना हो, नौकरी में रिश्वतखोरी हो या कामचोरी—तो इन गुनाहों की माफ़ी केवल हज करने से नहीं मिलेगी। अल्लाह उन गुनाहों को माफ़ नहीं करेगा जिनका संबंध इंसानों के अधिकारों से है, जब तक कि वह पीड़ित व्यक्ति स्वयं माफ़ न कर दे या उसका हिसाब चुकता न किया जाए।
अल्लाह की रहमत की सीमा: लेखक का मत है कि अल्लाह शायद नमाज़ या रोज़े की कोताही (ग़फ़लत) को अपनी रहमत से माफ़ कर दे, क्योंकि वे 'हुकूक-अल्लाह' हैं। लेकिन दूसरों का हक मारकर किया गया हज रूहानी तौर पर अधूरा है।
गज़ा का दर्द और ज़ुल्म की इंतिहा: किताब में बार-बार गज़ा के मजलूमों पर हो रहे जुल्म-ओ-सितम का ज़िक्र आया है। लेखक ने उन मासूमों की तड़प को शब्दों में पिरोया है जो आज आधुनिक युग की सबसे बड़ी नस्लकुशी का शिकार हैं। गज़ा का ज़िक्र यहाँ सिर्फ़ एक भौगोलिक स्थान के रूप में नहीं, बल्कि उम्मत की 'ईमान' की कसौटी के रूप में किया गया है।
मुस्लिम हुक्मरानों की 'मुजरिमाना' खामोशी: लेखक ने बहुत ही निडरता से मुस्लिम मुल्कों के हुक्मरानों की खुदगर्ज़ी और बे-हिसी (Apathy) पर चिंता व्यक्त की है। किताब सवाल उठाती है कि अपनी कुर्सियां बचाने की फिक्र में डूबे ये हुक्मरान आखिर कब तक गज़ा के बच्चों के खून पर खामोश रहेंगे? उनकी यह खामोशी लेखक की नज़रों में एक ऐतिहासिक अपराध है।
हज और वैश्विक एकता (Ummah Unity): लेखक के अनुसार, जब एक हाजी अराफ़ात के मैदान में खड़ा होता है, तो वह पूरी दुनिया के मुसलमानों से जुड़ जाता है। ऐसे में गज़ा के दर्द से आँखें मूंद लेना हज की रूह के खिलाफ है। किताब हाजियों को याद दिलाती है कि उनकी दुआओं में फलस्तीन का नाम होना ज़रूरी है।
व्यवस्था और वास्तविकता: पुस्तक भारतीय हज कमेटी के सराहनीय कार्य (सस्ता हज उपलब्ध कराना) की प्रशंसा करती है, लेकिन साथ ही मीना के टेंटों जैसी कमियों को सुधारने की नेक सलाह भी देती है ताकि मध्यमवर्गीय हाजियों को बेहतर सुविधा मिल सके।

About the Author

ये मेरी 2025 के हज-ए-मुबारक के सफर की वो डायरी है, जिसमें मैंने इस मुकद्दस सफर की रुदाद और अपने दिल के एहसास को कलम-बंद करने की एक अदना सी कोशिश की है।

मैं कोई पेशावर अदीब या मुसन्निफ (राइटर) नहीं हूँ; मेरा पेशा तो टैक्स कंसल्टेंसी है, जहाँ मेरी दिन-रात की मसरूफियत टैक्सपेयर्स के उलझे हुए मामले को सुलझाने तक महदूद रहती है। मगर जब 2025 में मुझे अपनी अहल्या के साथ अल्लाह के घर की हाजरी का मौका मिला, तो वहाँ की सबक़त और रूहानियत ने मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया।

ये कोई किताबी दास्तान नहीं, बाल्की मेरे उन जज़्बातों का मजमूआ है जो मैंने उस अज़ीम-उश-शान सफ़र के दौरान महसूस किए। इसमें वही सादगी और खुलापन है जो एक आम इंसान के दिल में अपने रब की बारगाह में हाज़री के वक़्त होता है।

Book Details

ISBN: 9789357823531
Publisher: M A KAMAL
Number of Pages: 100
Availability: Available for Download (e-book)

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