लेखिका की ओर से
मैं हमेशा से यह मानती आई हूँ कि कुछ भावनाएँ कभी पूरी तरह शब्दों में नहीं ढल पातीं। वे हमारे भीतर ही शांत होकर रहती हैं, हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं और एक दिन स्वयं ही शब्दों का रूप ले लेती हैं।मेरे लिए कविता केवल लिखना नहीं है, बल्कि उन भावनाओं को जीना और उन पलों को संजोना है, जो अक्सर अनकहे रह जाते हैं।
"जो अनकहा रह गया" मेरा पहला कविता-संग्रह है। इस पुस्तक की हर कविता किसी भावना, किसी स्मृति, किसी अनुभव या मेरे जीवन के ऐसे पल से जुड़ी है जिसने मेरे मन को गहराई से छुआ है। इन पन्नों में आपको प्रेम, बिछड़ने का दर्द, आशा, आत्म-खोज, रिश्तों की गर्माहट और उन अनगिनत भावनाओं की झलक मिलेगी, जिन्हें हम सभी महसूस तो करते हैं, पर अक्सर शब्द नहीं दे पाते।
मैं यह दावा नहीं करती कि मेरी कविताओं में हर प्रश्न का उत्तर है। लेकिन मेरी एक छोटी-सी आशा है कि इन पंक्तियों के बीच कहीं न कहीं आपको अपने ही मन का एक अक्स दिखाई देगा। यदि इस पुस्तक को पढ़ते हुए कभी आपके मन में यह विचार आए कि "यह तो मेरी ही कहानी है," तो मैं समझूँगी कि मेरे शब्द अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुँच गए हैं।
"जो अनकहा रह गया" केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि भावनाओं की एक यात्रा है—उन एहसासों की, जिन्हें मैंने अपनी लेखनी के माध्यम से आवाज़ देने का प्रयास किया है। यह पुस्तक मेरी लेखन-यात्रा की मंज़िल नहीं, बल्कि उसकी पहली सीढ़ी है। मेरी इच्छा है कि मैं आगे भी अपने शब्दों के माध्यम से दिलों तक पहुँचती रहूँ और उन भावनाओं को अभिव्यक्ति देती रहूँ जो अक्सर अनकही रह जाती हैं।
मेरी इस यात्रा का हिस्सा बनने, "जो अनकहा रह गया" को पढ़ने और मेरे शब्दों पर विश्वास करने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद। मैं सच्चे मन से आशा करती हूँ कि यह पुस्तक आपके हृदय में एक विशेष स्थान बनाएगी और अंतिम पृष्ठ पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ बनी रहेगी।
— महिमा यादव