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भूमिका: जीवन, मृत्यु और वह अदृश्य डोर
हर इंसान के मन में, जीवन के किसी न किसी मोड़ पर, यह प्रश्न एक न एक दिन ज़रूर कौंधता है—आखिर मृत्यु क्या है? इंसान या कोई भी जीव जीता क्यों है और अचानक एक दिन सब कुछ छोड़कर चला क्यों जाता है?
जब हम दुनिया के बड़े-बड़े अस्पतालों और चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि इंसानों ने अंतरिक्ष में रॉकेट भेजने के लिए सेकंड के 0.0001वें हिस्से की गणितीय सटीकता (Mathematical Precision) हासिल कर ली है। विज्ञान का दावा है कि वह अणु से लेकर ब्रह्मांड तक सब कुछ नाप सकता है। लेकिन वही विज्ञान, वही बड़े-बड़े डॉक्टर अपने ही जीवन और मृत्यु के अंतिम सत्य के आगे आकर एकदम बेबस, असहाय और निरुत्तर होकर खड़े हो जाते हैं।
डॉक्टर कहते हैं कि दिल की धड़कन रुक जाना मौत है, या दिमाग का काम न करना मौत है। वे नसों के ब्लॉकेज, फेफड़ों की बीमारी या अंगों के फेल होने का हवाला देते हैं। लेकिन क्या सिर्फ अंगों का ठीक या खराब होना ही जिंदगी और मौत का अंतिम पैमाना है? अगर ऐसा होता, तो दुनिया में इतने विरोधाभास क्यों देखने को मिलते?
मैंने अपनी इन नंगी आँखों से प्रकृति के इस खेल को बहुत करीब से और बहुत गहराई से देखा है।
आप भी अपने आसपास ध्यान से देखिएगा—एक विशाल, विशालकाय, एकदम हरा-भरा और मजबूत पेड़ खड़ा है। उसकी जड़ें गहरी हैं, उसे भरपूर पानी मिल रहा है, अच्छी मिट्टी और खाद मिल रही है, बाहर से उसमें ज़रा सी भी कोई बीमारी नहीं दिखती। लेकिन अचानक... केवल दो-तीन दिनों के भीतर वह पूरा का पूरा हरा-भरा पेड़ सूखकर निर्जीव लकड़ी का ढाँचा बन जाता है! कोई नहीं बता पाता कि आखिर दो दिन में ऐसा क्या घट गया कि स्वस्थ जड़ें और हरी पत्तियाँ अचानक बेजान हो गईं?
इसके बिल्कुल उलट, आप एक दूसरे पेड़ को देखिए। उसका तना अंदर से पूरा खोखला हो चुका है, दीमकों और कीड़ों ने उसकी लकड़ी को अंदर से खाकर छलनी कर दिया है। वह पेड़ केवल बाहर की एक पतली सी छाल (Bark) पर टिका हुआ है। विज्ञान और तर्क के हिसाब से उस पेड़ को बहुत पहले गिरकर मर जाना चाहिए था। लेकिन आप हैरान रह जाएँगे कि वह खोखला पेड़ सालों-साल हरा-भरा रहता है! उसमें मौसम आने पर नए हरे-हरे पत्ते आते हैं, उसमें फूल खिलते हैं और फल भी आते हैं!
वैज्ञानिक दृष्टि से जिस शरीर को मर जाना चाहिए था, वह हँसता हुआ मुस्कुरा रहा है; और जो संपूर्ण रूप से स्वस्थ और मजबूत था, वह अचानक ढह गया! आखिर ऐसा क्यों होता है?
सच्चाई यह है कि यह शरीर—चाहे इंसान का हो, किसी जानवर का हो या किसी विशाल पेड़ का—यह केवल एक इंस्ट्रूमेंट (हार्डवेयर) है। जब तक उस इंस्ट्रूमेंट के अंदर बैठा हुआ अदृश्य 'सिम' (चेतना का कार्ड) ऊपर के 'सेंट्रल एक्सचेंज' से जुड़ा हुआ है, तब तक ढाँचा कितना भी जर्जर, पुराना या खोखला क्यों न हो जाए, जीवन उसमें धड़कता रहेगा और वह हरा-भरा रहेगा। लेकिन जिस पल उस सेंट्रल एक्सचेंज से उसका कनेक्शन काट दिया जाता है, उस पल दुनिया का बड़े से बड़ा डॉक्टर, आधुनिक से आधुनिक मेडिकल टेक्नोलॉजी या सबसे बेहतरीन खुराक भी उस शरीर के अंदर जीवन की एक छोटी सी साँस वापस नहीं फूँक सकती!
कुछ पेड़ ऐसे होते हैं जिन्हें ऊपर से पूरा काट दिया जाए, फिर भी वे अपनी कटी हुई ठूंठ से दोबारा अंकुरित होकर मुस्कुराने लगते हैं, क्योंकि उनका सिम नेटवर्क ऊपर से चालू है। और कुछ पेड़ ऐसे होते हैं जिनकी ज़रा सी टहनी क्या खरोंची, वे पूरा का पूरा सूख जाते हैं, क्योंकि उनका ऊपर से रीचार्ज और कनेक्शन समाप्त हो चुका है।
जब कोई हट्टा-कट्टा इंसान अचानक बैठे-बैठे दम तोड़ देता है, या जब माँ के गर्भ में सब कुछ ठीक होते हुए भी अचानक मिसकैरेज हो जाता है, तब सारे ज्योतिषी, सारे डॉक्टर और सारे दार्शनिक अपनी-अपनी किताबें खोलकर बहाने बनाने लगते हैं। कोई इसे जेनेटिक्स कहता है, तो कोई इसे किस्मत या ग्रहों का दोष बताता है। पर असली गणितीय सच्चाई तक कोई नहीं पहुँच पाता।
इसी बेबसी, इसी अनसुलझी पहेली और प्रकृति के इस गूढ़ नियम ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। यह किताब किसी कमरे में बैठकर कल्पना से लिखी गई कोई धार्मिक कथा नहीं है। यह मेरे अपने गहन ऑब्जर्वेशन, प्रकृति के प्रत्यक्ष अनुभवों, नसों के इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स और ब्रह्मांडीय तरंगों का एक निष्पक्ष और भावुक निचोड़ है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए, हर उस इंसान के लिए एक खोज है जो जीवन और मृत्यु के इस असली रहस्य को जानना चाहता है।
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