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कविता मनुष्य के अंतर्मन की वह भाषा है जो किसी औपचारिकता या आडंबर की मोहताज नहीं होती। जब कोई भावना मन को गहराई से स्पर्श करती है, जब कोई स्मृति अचानक हृदय के द्वार पर दस्तक देती है, या जब जीवन का कोई अनुभव भीतर एक प्रश्न या अनुभूति जगाता है, तब वही अनुभूति शब्दों में ढलकर कविता बन जाती है। इस काव्य-संग्रह की रचनाएँ भी जीवन के ऐसे ही अनेक क्षणों से जन्मी हैं। कभी प्रेम की कोमलता से, कभी विरह की हल्की पीड़ा से, कभी प्रकृति की मधुरता से और कभी समय और देश काल की परिस्थितियों की विडंबनाओं से।
इस संग्रह का शीर्षक “आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ” अपने भीतर एक विशेष भावात्मक संसार को समेटे हुए है। यहाँ “मीत” केवल किसी एक व्यक्ति का संकेत नहीं है; वह आत्मीयता, विश्वास और मानवीय संबंधों की उस गहराई का प्रतीक है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। मीत वह होता है जो हमारे सुख-दुख में सहभागी बनता है, जो हमारे मौन को भी समझने की क्षमता रखता है, और जो हमारे जीवन की यात्रा में हमारे साथ चलने का विश्वास देता है। जब कवि कहता है, “आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ”, तो वह वस्तुतः अपने शब्दों के माध्यम से उस आत्मीयता को रचने का प्रयास करता है जो जीवन को अधिक मानवीय और अधिक खूबसूरत बनाती है।
इस काव्य-संग्रह की कविताएँ जीवन के अनेक रंगों को समेटने का प्रयास करती हैं। कहीं प्रेम की सहज मुस्कान है, कहीं स्मृतियों की हल्की आहट। कहीं मन की बेचैनी है, तो कहीं उम्मीद की एक उजली किरण। जीवन के ये छोटे-छोटे पल ही वास्तव में हमारी संवेदनाओं का आधार बनते हैं। अक्सर वही पल, जो देखने में बहुत साधारण लगते हैं, हमारे भीतर सबसे गहरी छाप छोड़ जाते हैं। मैंने इन्हीं खूबसूरत पलों को शब्दों में सँजोने का प्रयास किया है।
इस संग्रह की अनेक कविताओं में प्रकृति भी एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के रूप में दिखाई देती है। आकाश की विशालता, चाँद की शीतलता, हवाओं की सरसराहट, ऋतुओं का परिवर्तन, ये सब मेरी कविताओं में कवि के मन के साथ जैसे संवाद करते हुए प्रतीत होते हैं। प्रकृति केवल दृश्य नहीं है; वह मनुष्य की संवेदनाओं का एक विस्तार भी है। कई बार मनुष्य अपने भीतर की भावनाओं को प्रकृति के माध्यम से अधिक सहजता से व्यक्त कर पाता है। इसलिए इस काव्य-संग्रह में प्रकृति और मनुष्य के भाव एक-दूसरे के साथ घुलते-मिलते दिखाई देते हैं।
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