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तुझे देखने को तरसा
तड़प, बेचैनी और इंतज़ार की दास्तान
क्या प्रेम करना कभी अपराध बन सकता है?
क्या कोई व्यक्ति बिना अपना पक्ष रखे, बिना अपनी बात सुने, किसी का सबसे बड़ा गुनहगार ठहरा दिया जा सकता है?
और यदि कोई निर्दोष व्यक्ति स्वयं को ही दोषी मान बैठे, तो उसकी सबसे बड़ी सज़ा क्या होती है?
"तुझे देखने को तरसा" केवल एक प्रेमकथा नहीं है, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग, सामाजिक विषमताओं, जातिगत भेदभाव, प्रतीक्षा और एक अनकहे सत्य की ऐसी मार्मिक यात्रा है, जो पाठक को पहले पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक अपने साथ बाँधे रखती है।
यह कहानी है शुभम की—एक सरल, संवेदनशील और सच्चे हृदय वाले युवक की, जिसने प्रेम को कभी अधिकार नहीं, बल्कि पूजा माना। उसके लिए प्रेम का अर्थ किसी को पाना नहीं, बल्कि उसके सम्मान, उसकी मुस्कान और उसके सुख की रक्षा करना था। उसके जीवन में एक दिन सुधी आती है। दोनों के बीच ऐसा निष्कलुष प्रेम जन्म लेता है, जिसमें स्वार्थ नहीं, केवल समर्पण होता है। शुभम अपने भविष्य के प्रत्येक स्वप्न में केवल सुधी को देखता है। उसके लिए वही उसका संसार, उसकी आशा और उसके जीवन का सबसे सुंदर अध्याय बन जाती है।
किन्तु समय हमेशा प्रेम की परीक्षा लेता है।
परिस्थितियाँ बदलती हैं। विश्वास की जगह संदेह ले लेता है। एक ऐसा आरोप शुभम के जीवन पर लगा दिया जाता है, जिसका कारण स्वयं शुभम भी कभी समझ नहीं पाता। वह बार-बार अपने अतीत को टटोलता है। अपने प्रत्येक शब्द, प्रत्येक व्यवहार और प्रत्येक स्मृति को याद करता है। वह स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछता है—
"मेरा गुनाह क्या था?"
किन्तु उसे कहीं भी अपना अपराध दिखाई नहीं देता।
दूसरी ओर समाज बिना सत्य जाने अपना निर्णय सुना देता है। लोग घटनाओं से अधिक अफवाहों पर विश्वास करने लगते हैं। शुभम का मौन ही उसके विरुद्ध सबसे बड़ा प्रमाण बना दिया जाता है। वह भीतर-ही-भीतर टूटता जाता है। अपने ही मन में स्वयं को दोषी मानकर जीता है, जबकि उसे आज तक यह ज्ञात नहीं हो पाता कि उसकी वास्तविक भूल क्या थी।
यह केवल एक युवक की पीड़ा नहीं है, बल्कि उस समाज का दर्पण भी है, जहाँ कई बार आरोप सत्य से अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और निर्णय न्याय से पहले सुना दिए जाते हैं।
इस उपन्यास में केवल प्रेम की कहानी नहीं है। इसमें गाँव की मिट्टी की सोंधी महक है, विद्यालय की निश्छल मित्रता है, युवावस्था के सपने हैं, परिवार की संवेदनाएँ हैं, जातिगत भेदभाव की कटु वास्तविकता है, सामाजिक कुरीतियों का दर्द है, और उन लोगों का मौन संघर्ष भी है, जिन्हें कभी अपनी बात कहने का अवसर ही नहीं मिलता।
कहानी में सोनी जैसे पात्र भी हैं, जिनकी मित्रता पाठक के हृदय को गहराई तक स्पर्श करती है। कुछ संबंधों का कोई नाम नहीं होता, फिर भी वे जीवन के सबसे अमूल्य संबंध बन जाते हैं। यही संबंध इस कथा को केवल प्रेमकथा नहीं रहने देते, बल्कि इसे मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज़ बना देते हैं।
"तुझे देखने को तरसा" उन लोगों की भी कहानी है, जो किसी की प्रतीक्षा करते-करते स्वयं समय बन जाते हैं। यह उन अधूरे पत्रों, अधूरी बातों और अधूरी मुलाक़ातों की कहानी है, जो वर्षों बाद भी मन में जीवित रहती हैं। यहाँ प्रेम केवल मिलन का नाम नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और अंतहीन प्रतीक्षा का दूसरा नाम है।
इस उपन्यास का प्रत्येक अध्याय पाठक को भावनात्मक रूप से झकझोरता है। कभी मुस्कान देता है, कभी आँखें नम कर देता है और कभी ऐसा प्रश्न छोड़ जाता है, जिसका उत्तर अगले पृष्ठ तक पहुँचने के लिए विवश कर देता है।
यदि आपको साहित्यिक शैली में लिखे गए हिंदी उपन्यास, भावनात्मक प्रेमकथाएँ, रहस्य, सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक गहराई से भरपूर कथाएँ पढ़ना पसंद है, तो यह उपन्यास आपके लिए है। इसकी भाषा सरल होते हुए भी साहित्यिक है, पात्र जीवंत हैं और घटनाएँ पाठक को ऐसा अनुभव कराती हैं मानो वह स्वयं इस कथा का साक्षी हो।
यह उपन्यास केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।
और याद रखिए...
कुछ प्रश्नों के उत्तर अंतिम पृष्ठ पर नहीं मिलते।
कुछ प्रेम कहानियाँ मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होतीं।
कुछ प्रतीक्षाएँ जीवनभर चलती रहती हैं।
और कुछ निर्दोष लोग मरने के बाद भी अपने एक प्रश्न का उत्तर खोजते रहते हैं—
"आख़िर मेरा गुनाह क्या था?"
इस अनुत्तरित प्रश्न, शुभम की अंतिम इच्छा और उसके जीवन से जुड़े छिपे हुए रहस्यों का द्वार खुलता है इसके अगले भाग— "अब तू दिखती नहीं" में, जहाँ सत्य की खोज एक नई यात्रा आरंभ करती है।
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