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प्यार या Dopamine
आख़िर हम इंसान से प्यार करते हैं, या उससे मिलने वाली feeling से?
किसी का message आते ही चेहरे पर मुस्कान क्यों आ जाती है?
उसके दूर होते ही खालीपन क्यों महसूस होता है?
और किसी को खोने का डर—क्या सच में प्यार का सबूत है?
हम अक्सर आकर्षण को प्यार,
लगाव को प्यार,
आदत को प्यार,
ज़रूरत को प्यार
और attention को प्यार समझ बैठते हैं।
लेकिन क्या हर गहरी feeling प्यार होती है?
“प्यार या Dopamine” रिश्तों के उन्हीं अनदेखे हिस्सों की यात्रा है—जहाँ attraction, attachment, loneliness, validation, jealousy, habit और love एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
यह किताब प्यार को झूठा साबित करने नहीं आई।
यह सिर्फ़ एक सवाल पूछती है—
जब excitement कम हो जाए, attention मिलना बंद हो जाए और सामने वाला हमारी उम्मीदों के मुताबिक़ न रहे… तब भी क्या हम उसे उसी तरह चाह पाएँगे?
शायद प्यार किसी को अपना बना लेने का नाम नहीं।
शायद प्यार उस इंसान को उसकी पूरी आज़ादी, कमियों और सच्चाई के साथ देख पाने का नाम है।
और शायद सबसे मुश्किल सवाल यही है—
जिसे मैं इतने समय से प्यार समझता रहा…
वह प्यार था भी या नहीं?
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