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घर के रिश्ते
रिश्ते एक-दूसरे के विरुद्ध कैसे खड़े हो जाते हैं?
घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे के अपने होते हैं। माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, बच्चे अपने माता-पिता से जुड़े होते हैं और परिवार का हर सदस्य अपने तरीके से घर को संभालने का प्रयास करता है। फिर भी कभी-कभी ऐसा क्यों होता है कि एक ही घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे से दूर होने लगते हैं?
माँ और बच्चे के बीच गहरा भावनात्मक संबंध होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या कभी यही निकटता पिता से दूरी का कारण बन सकती है? क्या कोई बच्चा अनजाने में माता-पिता के आपसी संबंधों के बीच आ जाता है? क्या दूसरों की सलाह, पुराने अनुभव, मन में छिपा डर और अधूरी समझ घर के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं?
यह पुस्तक इन्हीं प्रश्नों की पड़ताल करती है।
इसमें किसी एक व्यक्ति, स्त्री, पुरुष या पीढ़ी को दोषी ठहराने के बजाय उन अदृश्य भावनात्मक प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास किया गया है, जिनसे प्रेम होते हुए भी गलत धारणाएँ बन जाती हैं और धीरे-धीरे रिश्तों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।
पुस्तक यह भी समझने का अवसर देती है कि बच्चे को माता-पिता के बीच किसी एक पक्ष का सदस्य बनने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए। उसे दोनों से अपने स्वतंत्र संबंध बनाने, अपनी समझ विकसित करने और बड़े होने पर अपने जीवन के निर्णय लेने की जगह मिलनी चाहिए।
बदलते समय में परिवार की स्वतंत्रता, जिम्मेदारियों, बाहरी प्रभावों और पीढ़ियों के बीच बदलते संबंधों को समझना भी आवश्यक है। पुरानी पीड़ा को समझना जरूरी है, लेकिन उसे वर्तमान के रिश्तों पर बोझ बनाकर रखना उचित नहीं।
घर के रिश्ते उन सभी पाठकों के लिए है जो अपने परिवार में होने वाली भावनात्मक दूरी को केवल गलती या दोष के रूप में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे कारणों और प्रक्रियाओं के रूप में समझना चाहते हैं।
क्योंकि घर में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता। लेकिन जब लोग एक-दूसरे को समझना छोड़ देते हैं, तो अपने ही लोग अजनबी दिखाई देने लगते हैं।
घर दीवारों से नहीं बचता। घर रिश्तों से बचता है।
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