Description
जड़ावरण
‘जड़ावरण’ महंत राजेश कुमार तिवारी “रंजन” की आरंभिक काव्य-कृति है, जिसकी रचना उन्होंने वर्ष 1986 में मात्र 17 वर्ष की आयु में की थी। लगभग चार दशक बाद यह कृति अपने मूल स्वरूप और मूल भावभूमि के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है।
यह पुस्तक उस समय के एक किशोर मन की प्रकृति, प्रेम, विरह, अनुभूति, संवेदना और कल्पना की सहज एवं मौलिक अभिव्यक्ति है। इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने इसे आज की दृष्टि से पुनर्लेखित या भाव-संशोधित नहीं किया है। उस समय जिन भावों और अनुभूतियों ने उनके मन में आकार लिया था, उन्हें उसी रूप में सुरक्षित रखा गया है।
रचनाकार के अनुसार, तब के भावों और आज के भावों में बहुत अंतर है। इसलिए लगभग चार दशक पुरानी इस रचना को वर्तमान दृष्टिकोण के अनुरूप बदलने के बजाय उसकी मूल संवेदना और रचनात्मक स्वरूप को सुरक्षित रखना अधिक उचित समझा गया।
‘जड़ावरण’ केवल एक पुरानी काव्य-कृति का पुनर्प्रकाशन नहीं है, बल्कि यह एक 17 वर्षीय रचनाकार की साहित्यिक और भावनात्मक यात्रा का दस्तावेज भी है। इसमें उस आयु की सहज संवेदनशीलता, प्रकृति के प्रति आकर्षण, कल्पना की उड़ान और भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को अनुभव किया जा सकता है।
महंत राजेश कुमार तिवारी “रंजन” की साहित्यिक यात्रा में वर्ष 1990 में प्रकाशित ‘इंद्रधनुष’ भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। ‘जड़ावरण’ उस साहित्यिक यात्रा की आरंभिक कड़ियों में से एक है और उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के उस दौर से पाठकों का परिचय कराती है, जब साहित्य उनके किशोर मन में अपनी प्रारंभिक आकृति ग्रहण कर रहा था।
यह कृति विशेष रूप से उन पाठकों के लिए रुचिकर हो सकती है जो हिंदी कविता, प्रकृति-काव्य, पुरानी साहित्यिक रचनाओं, किशोर मन की संवेदनाओं और रचनाकार की आरंभिक साहित्यिक चेतना को पढ़ना और समझना चाहते हैं।
‘जड़ावरण’ — एक 17 वर्षीय रचनाकार की लगभग चार दशक पुरानी भाव-यात्रा, जो आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है।
रचनाकार परिचय एवं प्रमुख कृतियाँ
महंत राजेश कुमार तिवारी "रंजन"
लेखक • कवि • योगाचार्य • आध्यात्मिक विद्वान
रचनाकार परिचय
महंत राजेश कुमार तिवारी "रंजन" साहित्य, अध्यात्म, योग, संस्कृत अध्ययन एवं भारतीय दर्शन से जुड़े रचनाकार हैं। वे वर्ष 1998 से ज्योतिर्लिंग शिवमठ, लखनऊ के महंत के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
रचनाकार ने विभिन्न विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। उनकी शैक्षिक एवं अकादमिक यात्रा विविध विषयों के अध्ययन के प्रति उनकी निरंतर जिज्ञासा और समर्पण को दर्शाती है। उन्हें विभिन्न विषयों में 18 शैक्षिक प्रमाण-पत्रों (डिग्री एवं डिप्लोमा) प्राप्त होने की उपलब्धि भी प्राप्त है।
शैक्षिक योग्यताएँ
MBA — Information System, Sikkim Manipal University
LLB — RML University, Faizabad
M.A. — Psychology, IGNOU
M.A. — Sanskrit, IGNOU
M.A. — Yoga, UPRTOU
M.A. — Jyotish, IGNOU
M.A. — Hindi Sahitya, Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad
M.A. — Philosophy, Kanpur University
M.A. — Political Science, Kanpur University
M.A. — Sociology, Kanpur University
B.Sc. — Physics, Mathematics & EVS
B.A. — Hindi, Philosophy & Political Science
Madhyama Visharad — Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad
Diploma — O Level, NIELIT
Diploma — RTI
Intermediate — Biology & Sanskrit
Intermediate — Science & Mathematics
High School — Science
साहित्यिक यात्रा
महंत राजेश कुमार तिवारी "रंजन" की साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण आरंभिक पड़ाव वर्ष 1986 है, जब उन्होंने मात्र 17 वर्ष की आयु में ‘जड़ावरण’ की रचना पूर्ण की।
लगभग चार दशक बाद प्रस्तुत की जा रही यह कृति उस समय के किशोर मन की प्रकृति, प्रेम, विरह, अनुभूति और कल्पना की सहज एवं मौलिक अभिव्यक्ति है।
वर्ष 1990 में ‘इंद्रधनुष’ का प्रकाशन उनकी साहित्यिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा। इसके पश्चात उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति विभिन्न काव्य एवं गद्य कृतियों में निरंतर विस्तृत होती रही।
प्रमुख कृतियाँ
काव्य-कृतियाँ
1. इंद्रधनुष — 1990 में प्रकाशित
2. जड़ावरण
3. गूँजे ध्वजा मम भारती
4. वंदना
5. राम जन्म भूमि गाथा — भाग 1, 2 एवं 3
6. ग़ज़ल-ए-रंजन
7. भक्ति सागर
8. अवहेलना
9. कुंडली शतक
गद्य रचनाएँ
10. मेरी पूर्णागिरि यात्रा
11. मेरे संस्मरण
आध्यात्मिक एवं रचनात्मक योगदान
महंत जी की रचनात्मकता में साहित्य और अध्यात्म का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे भगवान शिव को समर्पित मौलिक रचना ‘शिवताण्डवक’ के रचनाकार भी हैं। उनकी लेखनी में भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, प्रकृति, भक्ति और मानवीय संवेदनाओं के विविध रूपों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
‘जड़ावरण’ इसी साहित्यिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण आरंभिक कड़ी है—एक ऐसी कृति, जो 1986 में 17 वर्षीय रचनाकार के मन में जन्मी और लगभग चार दशक बाद उसी मूल भावभूमि के साथ पाठकों के समक्ष पुनः प्रस्तुत की जा रही है।