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यह किताब रिश्तों की सच्चाई और अपनों की असलियत को गहराई से उजागर करती है।
हम सबके जीवन में अच्छे और बुरे दिन आते हैं। अच्छे वक्त में लोग हमारे साथ खड़े रहते हैं, लेकिन जैसे ही बुरा वक्त आता है, वही अपने लोग धीरे-धीरे दूरियां बनाने लगते हैं।
लेखक ने बड़े ही सरल लेकिन मार्मिक शब्दों में यह समझाने की कोशिश की है कि कौन सचमुच हमारा अपना है और कौन सिर्फ समय का साथी।
बुरे दिनों में अपनों का रवैया क्यों बदल जाता है।
रिश्तों के पीछे छिपे स्वार्थ और चेहरे कैसे पहचाने जाएँ।
और सबसे ज़रूरी हमें किनसे सावधान रहना चाहिए और खुद को कैसे मज़बूत रखना चाहिए।
यह किताब हर उस इंसान के लिए है जिसने कभी अपनों से उम्मीदें लगाई और फिर धोखा, दूरी या उदासीनता का सामना किया। यह आपको दर्द के बीच सच्चाई स्वीकार करने और आगे बढ़ने की हिम्मत देती है।
अपनों से सावधान में लेखक ने अपना 22 साल का बिताया हुआ भूतकाल, वर्तमान में ढालने की कोशिश की है, दिल्ली से मुंबई के सफ़र में अनगिनत बार जीवन से जुड़े हजारों अनुभव साँझा किये है, जैसे प्यार , धोखा , नौकरी , बेरोज़गारी , क़र्ज़, रिश्ते , परिवार , दोस्ती , भूख , गरीबी , फ़िल्मी दुनिया , अपने पुराने नौकरी के साथी और सीनियर लोग, सामाजिक झगड़े, बड़ी बर्बादी से लेकर जिंदा रहकर कुछ कर गुजरने की कोशिश , जरुरी नहीं वो जीवित रहते पूरी हो, सब कुछ अपने आस पास के अनुभव के आधार पर लिखा है। भविष्य में इस किताब में बहुत सी ऐसी बातें भी जुड़ने वाली है, जो पाठकों को बड़ा हैरान करने वाली है।
अपने लेखन के माध्यम से राकेश कुमार सर्वोदय ना केवल पाठकों का मनोरंजन करना चाहते हैं, बल्कि उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करना और समाज में सार्थक संवाद की शुरुआत करना भी उनका उद्देश्य है।
क्यों पढ़ें यह किताब?
अगर आप रिश्तों की गहराई को समझना चाहते हैं।
अगर आप जानना चाहते हैं कि बुरे वक्त में कौन आपका सच्चा साथी है।
अगर आप खुद को भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाना चाहते हैं।
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