पहले बिहार में चुनाव आते ही लोग जाति, धर्म, पार्टी/दल आदि में बंटने लगते थे! लेकिन, यह सब कबतक चल पाता। लोग अब इससे ऊब चुके हैं। अधिकांश लोगों का कहना है कि जाति-धर्म की राजनीति ने बिहार को एक पिछड़े राज्य की पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब बिहार को इससे निकलना ही होगा और हमें विकास-कार्यों को ध्यान में रखकर ऐसे नेता को चुनना होगा, जो बिहार को आगे ले जा सके और बिहार की पहचान एक विकसित राज्य के रूप में हो सके। ऐसे में कई लोगों को प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ से काफी उम्मीदें हैं। इसी बात को आगे बढ़ाती यह पुस्तक निःसंदेह आगामी चुनाव में एक महत्वपूर्ण राह दिखाएगी, ऐसा मुझे लगता है। आप इस पुस्तक को पढ़कर निराश नहीं होंगे, बल्कि महसूस करेंगे कि जो आपके मन में चल रहा है, उसी की वकालत करती है यह किताब।
वोटवाला पीके एक बेहतरीन किताब है। इस किताब को पढ़कर लगता है कि आगामी बिहार चुनाव की दशा और दिशा तय करने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। लेखक एवं प्रकाशक को बधाई!
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वोटवाला पीके एक बेहतरीन किताब है। इस किताब को पढ़कर लगता है कि आगामी बिहार चुनाव की दशा और दिशा तय करने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। लेखक एवं प्रकाशक को बधाई!
बिहार की राजनीति को नई दिशा देने वाली किताब
पहले बिहार में चुनाव आते ही लोग जाति, धर्म, पार्टी/दल आदि में बंटने लगते थे! लेकिन, यह सब कबतक चल पाता। लोग अब इससे ऊब चुके हैं। अधिकांश लोगों का कहना है कि जाति-धर्म की राजनीति ने बिहार को एक पिछड़े राज्य की पंक्ति में ला खड़ा किया है। अब बिहार को इससे निकलना ही होगा और हमें विकास-कार्यों को ध्यान में रखकर ऐसे नेता को चुनना होगा, जो बिहार को आगे ले जा सके और बिहार की पहचान एक विकसित राज्य के रूप में हो सके।
ऐसे में कई लोगों को प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ से काफी उम्मीदें हैं। इसी बात को आगे बढ़ाती यह पुस्तक निःसंदेह आगामी चुनाव में एक महत्वपूर्ण राह दिखाएगी, ऐसा मुझे लगता है। आप इस पुस्तक को पढ़कर निराश नहीं होंगे, बल्कि महसूस करेंगे कि जो आपके मन में चल रहा है, उसी की वकालत करती है यह किताब।