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अधूरीधूरी प्या स केवल एक स्त्री और एक पुरुपुष की कहा नी नहीं है, बल्कि उन रि श्तों की कहा नी है जो वि श्वा स, प्रेम, त्या ग और मौ न पर
टि के हो ते हैं।हैं यह उपन्या स मा नवी य इच्छा ओं, भा वना त्मक रि क्तता , वैवा हि क जी वन की जटि लता ओं और उन नि र्णयों के दूरगा मी
परि णा मों का गहन मनो वैज्ञा नि क एवं सा मा जि क चि त्रण प्रस्तुततु करता है।
कहा नी की ना यि का अपने अती त के कुछ ऐसे रहस्यों के सा थ वि वा ह करती है जि न्हें वह अपने भी तर ही दबा कर रखना चा हती है।
उसका पति एक संवेदनशी ल, परि पक्व और जि म्मेदार व्यक्ति है, जो परि वा र, सम्मा न और बच्चों के भवि ष्य को सर्वो परि मा नता है।
समय के सा थ रि श्ते में दरा रें उभरती हैं, हैं वि श्वा स कमजो र पड़ता है और दोनों के बी च बढ़ती भा वना त्मक दूरी पूरे परि वा र को प्रभा वि त
करने लगती है।
पति अनेक सच्चा इयों को जा नते हुए भी परि वा र को टूटने से बचा ने का प्रया स करता है। वह अपमा न, पी ड़ा और अकेलेपन को
अपने भी तर समेटकर बच्चों के भवि ष्य के लि ए मौ न का कठि न मा र्ग चुनचुता है। दूसरी ओर, ना यि का अपने भी तर की बेचैनी , असंतो ष
और लगा ता र नए आकर्षणों की ओर झुकाझु काव से संघर्ष करती रहती है। अंततः उसके एक नि र्णय से वर्षों से बना परि वा र बि खर जा ता
है और हर पा त्र को अपने-अपने हि स्से का दर्दसहना पड़ता है।
यह उपन्या स कि सी व्यक्ति या लिं ग का न्या य नहीं करता , बल्कि यह प्रश्न उठा ता है कि जब वि श्वा स टूटता है, तब उसका सबसे
गहरा प्रभा व कि न लो गों पर पड़ता है। प्रेम, वि श्वा सघा त, अपरा धबो ध, क्षमा , त्या ग, अकेला पन, सा मा जि क दबा व और परि वा र की
बदलती परि भा षा —इन सभी आया मों को यह कथा संवेदनशी लता और यथा र्थ के सा थ प्रस्तुततु करती है।
अधूरीधूरी प्या स एक भा वना त्मक, मनो वैज्ञा नि क और सा मा जि क उपन्या स है, जो पा ठकों को रि श्तों की ना ज़ुकज़ु ता , मा नवी य कमजो रि यों
और हर नि र्णय की की मत पर गंभीगं भीरता से सो चने के लि ए प्रेरि त करता है।
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