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अधूरी प्यास (eBook)

एक स्त्री, एक पित, टूटता पिरवार और अनंत इच्छाओं की कहानी
Type: e-book
Genre: Romance, Sex & Relationships
Language: Hindi
Price: ₹86
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

अधूरीधूरी प्या स केवल एक स्त्री और एक पुरुपुष की कहा नी नहीं है, बल्कि उन रि श्तों की कहा नी है जो वि श्वा स, प्रेम, त्या ग और मौ न पर
टि के हो ते हैं।हैं यह उपन्या स मा नवी य इच्छा ओं, भा वना त्मक रि क्तता , वैवा हि क जी वन की जटि लता ओं और उन नि र्णयों के दूरगा मी
परि णा मों का गहन मनो वैज्ञा नि क एवं सा मा जि क चि त्रण प्रस्तुततु करता है।
कहा नी की ना यि का अपने अती त के कुछ ऐसे रहस्यों के सा थ वि वा ह करती है जि न्हें वह अपने भी तर ही दबा कर रखना चा हती है।
उसका पति एक संवेदनशी ल, परि पक्व और जि म्मेदार व्यक्ति है, जो परि वा र, सम्मा न और बच्चों के भवि ष्य को सर्वो परि मा नता है।
समय के सा थ रि श्ते में दरा रें उभरती हैं, हैं वि श्वा स कमजो र पड़ता है और दोनों के बी च बढ़ती भा वना त्मक दूरी पूरे परि वा र को प्रभा वि त
करने लगती है।
पति अनेक सच्चा इयों को जा नते हुए भी परि वा र को टूटने से बचा ने का प्रया स करता है। वह अपमा न, पी ड़ा और अकेलेपन को
अपने भी तर समेटकर बच्चों के भवि ष्य के लि ए मौ न का कठि न मा र्ग चुनचुता है। दूसरी ओर, ना यि का अपने भी तर की बेचैनी , असंतो ष
और लगा ता र नए आकर्षणों की ओर झुकाझु काव से संघर्ष करती रहती है। अंततः उसके एक नि र्णय से वर्षों से बना परि वा र बि खर जा ता
है और हर पा त्र को अपने-अपने हि स्से का दर्दसहना पड़ता है।
यह उपन्या स कि सी व्यक्ति या लिं ग का न्या य नहीं करता , बल्कि यह प्रश्न उठा ता है कि जब वि श्वा स टूटता है, तब उसका सबसे
गहरा प्रभा व कि न लो गों पर पड़ता है। प्रेम, वि श्वा सघा त, अपरा धबो ध, क्षमा , त्या ग, अकेला पन, सा मा जि क दबा व और परि वा र की
बदलती परि भा षा —इन सभी आया मों को यह कथा संवेदनशी लता और यथा र्थ के सा थ प्रस्तुततु करती है।
अधूरीधूरी प्या स एक भा वना त्मक, मनो वैज्ञा नि क और सा मा जि क उपन्या स है, जो पा ठकों को रि श्तों की ना ज़ुकज़ु ता , मा नवी य कमजो रि यों
और हर नि र्णय की की मत पर गंभीगं भीरता से सो चने के लि ए प्रेरि त करता है।

About the Author

रुपेश रंजन समकालीन हिंदी साहित्य के एक संवेदनशील और बहुआयामी कवि हैं। उनकी रचनात्मकता में प्रेम की कोमलता, विरह की पीड़ा, प्रकृति की सुंदरता, मानवीय संबंधों की जटिलता और जीवन के दार्शनिक प्रश्न एक साथ दिखाई देते हैं। उनकी कविताएँ मनुष्य के भीतर चलने वाले उन मौन संवादों को शब्द देती हैं, जिन्हें अक्सर व्यक्ति स्वयं भी स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता।

रुपेश रंजन की कविता का मूल स्वर मनुष्यता और संवेदना का स्वर है। उनके लिए प्रेम केवल किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि जीवन को जोड़ने वाली एक व्यापक अनुभूति है। उनके काव्य में प्रेम कभी वर्षा बनकर आता है, कभी स्मृति बनकर, कभी प्रतीक्षा बनकर और कभी ऐसी मौन उपस्थिति बनकर, जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। उनकी प्रेम-कविताओं में श्रृंगार के साथ-साथ आत्मिकता और दार्शनिक गहराई भी दिखाई देती है।

प्रकृति भी उनके काव्य-संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षा, चाँदनी, सावन, नदी, धरती, आकाश, ऋतुएँ और हवाएँ उनके लिए केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं हैं; वे मानवीय भावनाओं के प्रतीक बन जाते हैं। बादलों में उन्हें प्रतीक्षा दिखाई देती है, वर्षा में प्रेम की अनुभूति और चाँदनी में स्मृतियों की उजली छाया।

उनकी कविताओं में विरह का स्वर विशेष रूप से प्रभावशाली है। अनुपस्थित व्यक्ति की उपस्थिति, कही न जा सकने वाली बातों का भार, अधूरी इच्छाओं की कसक और स्मृतियों का लगातार लौटना उनके काव्य को आत्मीय बनाता है। उनका विरह केवल दुःख नहीं है; वह आत्मचिंतन और आत्म-अन्वेषण का माध्यम भी बन जाता है।

रुपेश रंजन की काव्य-भाषा सहज होते हुए भी भाव-संपन्न है। वे कठिन भावों को सरल शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करते हैं। उनकी कविता में लोक-संवेदना, हिंदी की स्वाभाविक लय, उर्दू की नज़ाकत और भारतीय काव्य-परंपरा की भावभूमि का सुंदर मेल देखने को मिलता है। कहीं उनकी पंक्तियाँ गीतात्मक हो जाती हैं, कहीं सूक्तिपरक और कहीं आत्मसंवाद जैसी प्रतीत होती हैं।

उनकी रचनात्मक दृष्टि में प्रेम और सामाजिक चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। वे व्यक्ति के भीतर के संसार के साथ-साथ समाज, स्त्री, समानता, स्वतंत्रता, शांति, न्याय और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को भी साहित्य के केंद्र में रखते हैं। इसलिए उनका कवि केवल प्रेम का कवि नहीं, बल्कि मनुष्य और मनुष्यता का कवि भी है।

रुपेश रंजन की कविता में भारतीय सांस्कृतिक और दार्शनिक चेतना की छाप भी दिखाई देती है। भारतीय परंपरा, गांधी, बुद्ध, कबीर, गीता, प्रकृति और मानवीय नैतिकता जैसे व्यापक विचार उनके चिंतन की पृष्ठभूमि निर्मित करते हैं। लेकिन उनकी कविता किसी एक विचारधारा में स्वयं को सीमित नहीं करती; वह प्रश्न करती है, अनुभव करती है और पाठक को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करती है।

उनकी काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे कविता को केवल प्रकाशन या लोकप्रियता का माध्यम नहीं मानते, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और मानवीय संवाद का साधन समझते हैं। उनकी दृष्टि में कविता वह स्थान है जहाँ मनुष्य अपने सबसे सच्चे रूप में स्वयं से मिल सकता है।

रुपेश रंजन का कवि-स्वर अंततः प्रेम, प्रकृति, पीड़ा, प्रश्न और उम्मीद का स्वर है। उनकी कविताएँ पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने, ठहरने और अपने भीतर झाँकने के लिए आमंत्रित करती हैं। यही उनकी काव्य-संवेदना की सबसे बड़ी विशेषता है।

उनकी कविता का विश्वास सरल है—
जहाँ संवेदना जीवित है, वहाँ कविता जीवित है;
जहाँ प्रेम बचा है, वहाँ मनुष्य बचा है।

रुपेश रंजन इसी प्रेम, संवेदना और मानवीय चेतना को अपनी कविता के माध्यम से शब्द देने वाले कवि हैं।

Book Details

Number of Pages: 109
Availability: Available for Download (e-book)

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