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चार ऋतुएँ प्रेम की (eBook)

अधूरे इश्क़ से पूर्ण समर्पण तक
Type: e-book
Genre: Romance, Sapiential Novel
Language: Hindi
Price: ₹75
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

"चा र ऋतुएँतुएँप्रेम की : अधूरेधूरेइश्क़ से पूर्ण समर्पण तक" केवल एक प्रेम कहा नी नहीं है, बल्कि मनुष्नुय के हृदय, स्मृतिमृतियों
और संबंधों की जटि लता ओं की एक गहन सा हि त्यि क या त्रा है। यह उपन्या स प्रेम के उन वि वि ध रूपों को प्रस्तुततु करता
है, जि नमें मा सूमि यत भी है, बि छड़ने की पी ड़ा भी ; आकर्षण भी है, वि श्वा सघा त भी ; रहस्य भी है, जी वन-मृत्मृयु का संघर्ष
भी ; और अंततः ऐसा समर्पण भी है जो प्रेम को उसकी सबसे शुद्धशु अवस्था में स्था पि त करता है।
कथा का ना यक जी वन के चा र अलग-अलग प्रेम संबंधों से गुजगुरता है। पहला प्रेम एक अप्रत्या शि त दुर्घदुर्घटना में समा प्त हो
जा ता है और उसके सा थ उसके जी वन का एक उजला अध्या य भी । दूसरा प्रेम उसे यह एहसा स करा ता है कि आकर्षण
और प्रेम हमेशा एक ही बा त नहीं हो ते। ती सरा संबंध उसे ऐसे षड्यं त्र के बी च ला खड़ा करता है जहाँ प्रेम, भय और
वि श्वा सघा त एक-दूसरे में उलझ जा ते हैं।हैं इन सबके बा द उसके जी वन में एक ऐसी स्त्री का प्रवेश हो ता है जि सकी
सा दगी , नि स्वा र्थता और समर्पण उसे प्रेम का वा स्तवि क अर्थ समझा ते हैं।हैं
यह उपन्या स केवल घटना ओं का क्रम नहीं , हीं बल्कि मनो वैज्ञा नि क और भा वना त्मक परि वर्तन की कथा है। इसमें प्रेम के
सा थ-सा थ अकेला पन, स्मृतिमृतियाँ , अपरा धबो ध, वि श्वा स, क्षमा , आत्मसंघर्ष, मा नवी य इच्छा एँ, एँभा वना त्मक नि कटता ,
सा मा जि क यथा र्थ और जी वन के कठि न नि र्णयों का सूक्ष्म चि त्रण कि या गया है। रहस्य और रो मां च कथा को नि रंतर
आगे बढ़ा ते हैं, हैं जबकि पा त्रों की आंतरि क या त्रा पा ठक को उनके सा थ जी ने का अनुभनुव करा ती है।
लेखक ने मा नवी य संबंधों की नि कटता , आकर्षण और दैहि क आकां क्षा ओं को अश्ली लता से दूर रखते हुए सा हि त्यि क
गरि मा , संवेदनशी लता और मनो वैज्ञा नि क गहरा ई के सा थ प्रस्तुततु करने का प्रया स कि या है। यही का रण है कि यह
उपन्या स केवल प्रेम का वर्णन नहीं करता , बल्कि प्रेम के भी तर छि पे भय, मो ह, अधि का र, समर्पण और आत्मस्वी का र को
भी उजा गर करता है।
यह पुस्पुतक उन सभी पा ठकों के लि ए है जि न्हों ने कभी प्रेम कि या है, कि सी अपने को खो या है, वि श्वा सघा त का दर्दसहा
है, या जी वन में दूसरी शुरुशुआत करने का सा हस जुटाजुटाया है। प्रत्येक अध्या य पा ठक को यह अनुभनुव करा ता है कि प्रेम
केवल कि सी दूसरे व्यक्ति तक पहुँचने की या त्रा नहीं , हीं बल्कि स्वयं को पहचा नने और स्वी का र करने की प्रक्रि या भी
है।
"चा र ऋतुएँतुएँप्रेम की : अधूरेधूरेइश्क़ से पूर्ण समर्पण तक" अंततः यह संदेश देती है कि जी वन में हर प्रेम अपनी मंज़िमंज़िल तक
नहीं पहुँचता , लेकि न हर प्रेम मनुष्नुय को कुछ न कुछ सि खा कर अवश्य जा ता है। कभी वह हमें टूटना सि खा ता है, कभी
संभलना ; कभी खो ना , तो कभी स्वयं को फि र से खो ज लेना । और शा यद इसी या त्रा में सच्चे प्रेम का वा स्तवि क अर्थ
छि पा हो ता है।

About the Author

रूपेश रंजन एक स्वतंत्र लेखक, कवि , शो धकर्ता और सा मा जि क-रा जनी ति क वि षयों के गंभीगं भीर अध्येता हैं।हैं सा हि त्य,
दर्शन, इति हा स, समा जशा स्त्र, रा जनी ति , प्रशा सन तथा मा नवी य मनो वि ज्ञा न उनके अध्ययन और लेखन के प्रमुखमु क्षेत्र
हैं।हैं उनकी रचना ओं में संवेदनशी लता , वैचा रि क गहरा ई और जी वन के यथा र्थ का संतुलितुलित समन्वय दि खा ई देता है।
लेखक का मा नना है कि सा हि त्य केवल मनो रंजन का मा ध्यम नहीं , हीं बल्कि समा ज, व्यक्ति और समय के बी च संवा द
स्था पि त करने की एक सशक्त प्रक्रि या है। इसी वि श्वा स के सा थ वे ऐसे वि षयों पर लेखन करते हैं जो मनुष्नुय के
अंतर्मन, सा मा जि क संरचना ओं, नैति क प्रश्नों और बदलती मा नवी य संवेदना ओं को गहरा ई से स्पर्श करते हैं।हैं
"चा र ऋतुएँतुएँप्रेम की : अधूरेधूरेइश्क़ से पूर्ण समर्पण तक" प्रेम, वि यो ग, वि श्वा स, वि श्वा सघा त, रहस्य, आत्मसंघर्ष और
पुनपुर्जन्म की भा वना त्मक या त्रा को प्रस्तुततु करने वा ला उनका एक महत्वपूर्ण सा हि त्यि क प्रया स है। यह उपन्या स केवल
प्रेम संबंधों की कहा नी नहीं , हीं बल्कि मनुष्नुय के भी तर चलने वा ले उन अदृश्य संघर्षों की कथा है जो उसे तो ड़ते भी हैं और
परि पक्व भी बना ते हैं।हैं
लेखन के अति रि क्त रूपेश रंजन समसा मयि क वि षयों , भा रती य चिं तन, प्रशा सनि क अध्ययन तथा सा मा जि क परि वर्तन
से जुड़ेजुड़े वि षयों पर भी नि रंतर अध्ययन और सृजना त्मक का र्य करते हैं।हैं उनका उद्देश्य ऐसी रचना एँ प्रस्तुततु करना है जो
पा ठकों को केवल पढ़ने के लि ए नहीं , हीं बल्कि सो चने, महसूस करने और आत्ममंथमं न करने के लि ए प्रेरि त करें।रें
उनका वि श्वा स है कि शब्दों की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे समय बी त जा ने के बा द भी मनुष्नुय के भी तर जी वि त रहते
हैं।

Book Details

Number of Pages: 228
Availability: Available for Download (e-book)

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चार ऋतुएँ प्रेम की

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