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"जब लौ टना संभव नहीं था " केवल एक प्रेमकथा नहीं , हीं बल्कि मा नवी य संबंधों की जटि लता ओं, वि श्वा स के टूटने,
अपरा धबो ध, त्या ग, क्षमा और जी वन के कठि न नि र्णयों की गहन मनो वैज्ञा नि क या त्रा है। यह उपन्या स उन परि स्थि ति यों
का चि त्रण करता है जहाँ एक क्षणि क मुलामु लाक़ा त धी रे-धी रे अनेक जी वनों की दि शा बदल देती है और हर पा त्र अपने
नि र्णयों की की मत चुकाचु काने के लि ए वि वश हो जा ता है।
कहा नी की शुरुशुआत एक सा धा रण रेल या त्रा से हो ती है, जहाँ दो अनजा न लो ग संयो गवश मि लते हैं।हैं बा तची त का
सि लसि ला बढ़ता है, भा वना एँ गहरी हो ती जा ती हैं और एक ऐसा संबंध जन्म लेता है, जो सा मा जि क मर्या दाओं और
पा रि वा रि क दायि त्वों की सी मा ओं को चुनौचुनौती देता है। समय के सा थ यह संबंध केवल दो व्यक्ति यों तक सी मि त नहीं
रहता , बल्कि कई परि वा रों , बच्चों और रि श्तों के जी वन को प्रभा वि त करता है।
उपन्या स का प्रत्येक पा त्र अपने भी तर एक अलग संघर्ष लेकर चलता है। को ई प्रेम और कर्तव्य के बी च बँटा हुआ है,
को ई वि श्वा सघा त की पी ड़ा से टूट रहा है, को ई अपने परि वा र को बचा ने का प्रया स कर रहा है, तो को ई अपने ही
नि र्णयों के परि णा मों के सा थ जी ना सी ख रहा है। यहाँ को ई पूर्णतः ना यक नहीं है और न ही को ई पूर्णतः खलना यक।
सभी पा त्र अपनी मा नवी य कमजो रि यों , संवेदना ओं और वि वशता ओं के सा थ प्रस्तुततु कि ए गए हैं।हैं
यह कृति कि सी भी प्रका र के वि वा हेतर संबंध या सा मा जि क मर्या दाओं के उल्लंघन का समर्थन या महि मा मंडमं न नहीं
करती । इसके वि परी त, यह दि खा ती है कि भा वना त्मक नि र्णयों के दूरगा मी परि णा म कि तने गहरे और पी ड़ा दायक हो
सकते हैं।हैं प्रेम यदि उत्तरदायि त्व से अलग हो जा ए, तो वह केवल दो हृदयों को नहीं , हीं बल्कि अनेक जी वनों को घा यल
कर सकता है। इसी सत्य को यह उपन्या स संवेदनशी लता और संतुलितुलित दृष्टि को ण के सा थ प्रस्तुततु करता है।
"जब लौ टना संभव नहीं था " प्रेम, परि वा र, वि श्वा स, क्षमा और आत्मस्वी कृति की ऐसी कथा है, जो पा ठकों को केवल
कहा नी पढ़ने के लि ए नहीं , हीं बल्कि अपने जी वन, अपने संबंधों और अपने नि र्णयों पर वि चा र करने के लि ए भी प्रेरि त
करती है। यह उपन्या स अंततः यही संदेश देता है कि जी वन में कुछ भूलोंभू लों को मि टा या नहीं जा सकता , पर उन्हें
स्वी का र कर, उनसे सी खकर और दूसरों के प्रति संवेदनशी ल हो कर आगे बढ़ा जा सकता है। यही स्वी का र, यही
उत्तरदायि त्व और यही मा नवी य करुणा इस उपन्या स की आत्मा है।
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