You can access the distribution details by navigating to My pre-printed books > Distribution

Add a Review

जब लौटना संभव नहीं था (eBook)

Type: e-book
Genre: Romance, Sapiential Novel
Language: Hindi
Price: ₹78
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

"जब लौ टना संभव नहीं था " केवल एक प्रेमकथा नहीं , हीं बल्कि मा नवी य संबंधों की जटि लता ओं, वि श्वा स के टूटने,
अपरा धबो ध, त्या ग, क्षमा और जी वन के कठि न नि र्णयों की गहन मनो वैज्ञा नि क या त्रा है। यह उपन्या स उन परि स्थि ति यों
का चि त्रण करता है जहाँ एक क्षणि क मुलामु लाक़ा त धी रे-धी रे अनेक जी वनों की दि शा बदल देती है और हर पा त्र अपने
नि र्णयों की की मत चुकाचु काने के लि ए वि वश हो जा ता है।
कहा नी की शुरुशुआत एक सा धा रण रेल या त्रा से हो ती है, जहाँ दो अनजा न लो ग संयो गवश मि लते हैं।हैं बा तची त का
सि लसि ला बढ़ता है, भा वना एँ गहरी हो ती जा ती हैं और एक ऐसा संबंध जन्म लेता है, जो सा मा जि क मर्या दाओं और
पा रि वा रि क दायि त्वों की सी मा ओं को चुनौचुनौती देता है। समय के सा थ यह संबंध केवल दो व्यक्ति यों तक सी मि त नहीं
रहता , बल्कि कई परि वा रों , बच्चों और रि श्तों के जी वन को प्रभा वि त करता है।
उपन्या स का प्रत्येक पा त्र अपने भी तर एक अलग संघर्ष लेकर चलता है। को ई प्रेम और कर्तव्य के बी च बँटा हुआ है,
को ई वि श्वा सघा त की पी ड़ा से टूट रहा है, को ई अपने परि वा र को बचा ने का प्रया स कर रहा है, तो को ई अपने ही
नि र्णयों के परि णा मों के सा थ जी ना सी ख रहा है। यहाँ को ई पूर्णतः ना यक नहीं है और न ही को ई पूर्णतः खलना यक।
सभी पा त्र अपनी मा नवी य कमजो रि यों , संवेदना ओं और वि वशता ओं के सा थ प्रस्तुततु कि ए गए हैं।हैं
यह कृति कि सी भी प्रका र के वि वा हेतर संबंध या सा मा जि क मर्या दाओं के उल्लंघन का समर्थन या महि मा मंडमं न नहीं
करती । इसके वि परी त, यह दि खा ती है कि भा वना त्मक नि र्णयों के दूरगा मी परि णा म कि तने गहरे और पी ड़ा दायक हो
सकते हैं।हैं प्रेम यदि उत्तरदायि त्व से अलग हो जा ए, तो वह केवल दो हृदयों को नहीं , हीं बल्कि अनेक जी वनों को घा यल
कर सकता है। इसी सत्य को यह उपन्या स संवेदनशी लता और संतुलितुलित दृष्टि को ण के सा थ प्रस्तुततु करता है।
"जब लौ टना संभव नहीं था " प्रेम, परि वा र, वि श्वा स, क्षमा और आत्मस्वी कृति की ऐसी कथा है, जो पा ठकों को केवल
कहा नी पढ़ने के लि ए नहीं , हीं बल्कि अपने जी वन, अपने संबंधों और अपने नि र्णयों पर वि चा र करने के लि ए भी प्रेरि त
करती है। यह उपन्या स अंततः यही संदेश देता है कि जी वन में कुछ भूलोंभू लों को मि टा या नहीं जा सकता , पर उन्हें
स्वी का र कर, उनसे सी खकर और दूसरों के प्रति संवेदनशी ल हो कर आगे बढ़ा जा सकता है। यही स्वी का र, यही
उत्तरदायि त्व और यही मा नवी य करुणा इस उपन्या स की आत्मा है।

About the Author

रूपेश रंजन समका ली न हिं दी सा हि त्य के उन रचना का रों में हैं जि नकी लेखनी मा नवी य भा वना ओं की गहरा इयों ,
सा मा जि क यथा र्थ, प्रेम, पी ड़ा , आत्मसंघर्ष और जी वन के दार्शनि क पक्षों को संवेदनशी लता के सा थ अभि व्यक्त करती
है। उनकी रचना ओं में केवल शब्दों का सौं दसौं र्य नहीं , हीं बल्कि जी वन के उन अनकहे अनुभनुवों की प्रति ध्वनि भी सुनासुनाई देती
है, जि न्हें अक्सर लो ग अपने भी तर दबा कर जी ते रहते हैं।हैं
लेखक का वि श्वा स है कि सा हि त्य केवल मनो रंजन का मा ध्यम नहीं , हीं बल्कि आत्ममंथमं न, संवेदना और सा मा जि क चेतना
का सशक्त सा धन है। इसी वि चा र के सा थ वे ऐसे पा त्रों और कथा नकों का सृजन करते हैं जो पा ठकों को स्वयं के
भी तर झाँ कने के लि ए प्रेरि त करते हैं।हैं
"जब लौ टना संभव नहीं था " उनका एक भा वना त्मक, मनो वैज्ञा नि क और सा मा जि क उपन्या स है, जि समें प्रेम, वि श्वा स,
अपरा धबो ध, वैवा हि क संबंधों , त्या ग, क्षमा और मा नवी य जटि लता ओं को अत्यंत संवेदनशी ल ढंग से प्रस्तुततु कि या गया
है। इस कृति का उद्देश्य कि सी पा त्र या नि र्णय का महि मा मंडमं न करना नहीं , हीं बल्कि यह दि खा ना है कि जी वन में लि ए गए
नि र्णय कि स प्रका र अनेक लो गों के जी वन को प्रभा वि त करते हैं और मनुष्नुय को अपने ही अंतर्मन के प्रश्नों से सा मना
करा ते हैं।हैं
रूपेश रंजन का मा नना है कि हर व्यक्ति के जी वन में कुछ ऐसे मो ड़ आते हैं जहाँ सही और गलत के बी च का नि र्णय
आसा न नहीं हो ता । ऐसे ही क्षणों में मनुष्नुय का वा स्तवि क चरि त्र, उसकी संवेदना एँ और उसकी जि म्मेदारि याँ सा मने
आती हैं।हैं उनकी लेखनी इन्हीं मा नवी य स्थि ति यों को गहरा ई और ईमा नदारी के सा थ अभि व्यक्त करने का प्रया स करती
है।
वे हिं दी भा षा और भा रती य सां स्कृति क मूल्मूयों के प्रति गहरा सम्मा न रखते हैं तथा ऐसी रचना एँ लि खने में वि श्वा स करते
हैं जो समय के सा थ भी अपनी प्रा संगि कता बना ए रखें और पा ठकों के हृदय में लंबे समय तक जी वि त रहें।

Book Details

Number of Pages: 153
Availability: Available for Download (e-book)

Ratings & Reviews

जब लौटना संभव नहीं था

जब लौटना संभव नहीं था

(Not Available)

Review This Book

Write your thoughts about this book.

Currently there are no reviews available for this book.

Be the first one to write a review for the book जब लौटना संभव नहीं था.

Other Books in Romance, Sapiential Novel

Shop with confidence

Safe and secured checkout, payments powered by Razorpay. Pay with Credit/Debit Cards, Net Banking, Wallets, UPI or via bank account transfer and Cheque/DD. Payment Option FAQs.