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वेदों और उपनिषदों की शिक्षाएँ (eBook)

धर्म, ज्ञान, चेतना , आत्मा , ब्रह्म, कर्म, जीवन और मोक्ष की एक व्यापक दार्शनिक यात्रा
Type: e-book
Genre: Philosophy, Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹151
(Immediate Access on Full Payment)
Available Formats: PDF

Description

वेदों और उपनि षदों की शि क्षा एँ
धर्म, ज्ञा न, चेतना , आत्मा , ब्रह्म, कर्म, जी वन और मो क्ष की एक व्या पक दार्शनि क या त्रा
लेखक: रुपेश रंजन
“वेदों और उपनि षदों की शि क्षा एँ”एँ भा रती य ज्ञा न-परंपरा के दो अत्यंत महत्वपूर्ण आया मों —वेद और उपनि षद—को
समझने का एक व्या पक, स्वतंत्र और चिं तनशी ल प्रया स है। यह पुस्पुतक केवल प्रा ची न धा र्मि क ग्रंथोंग्रं थों का परि चय देने
तक सी मि त नहीं है, बल्कि उनके भी तर उपस्थि त जी वन-दृष्टि , दार्शनि क प्रश्नों , नैति क वि चा रों , आध्या त्मि क खो ज और
मा नव अस्ति त्व से जुड़ेजुड़े गहरे प्रश्नों को आधुनिधुनिक पा ठक के सा मने सरल और वि स्तृततृ रूप में प्रस्तुततु करती है।
वेद भा रती य सभ्यता की प्रा ची नतम बौ द्धि क और आध्या त्मि क परंपरा ओं में से एक का प्रति नि धि त्व करते हैं।हैं उनमें
प्रकृति , ब्रह्मां ड, देवत्व, यज्ञ, ऋत, सत्य, प्रा र्थना , सा मा जि क जी वन और मनुष्नुय की आकां क्षा ओं से संबंधि त वि वि ध
वि चा र मि लते हैं।हैं उपनि षद इसी व्या पक परंपरा को एक गहन दार्शनि क दि शा प्रदान करते हैं और मनुष्नुय को बा हरी
जगत से भी तर के जगत की ओर ले जा ते हैं।हैं
इस पुस्पुतक की मूलमू या त्रा इसी परि वर्तन को समझने की या त्रा है।
बा हरी ब्रह्मां ड से आंतरि क चेतना तक।
प्रकृति से आत्मा तक।
कर्म से ज्ञा न तक।
प्रश्न से अनुभूनुतिभूति तक।
और अंततः आत्मबो ध से मुक्तिमुक्ति तक।
पुस्पुतक का प्रा रंभ इस प्रश्न से हो ता है कि वेद क्या हैं, हैं उनकी परंपरा क्या है और भा रती य चिं तन के नि र्मा ण में उनका
क्या यो गदान रहा है। इसके बा द ऋषि यों की ज्ञा न-दृष्टि , ऋत की अवधा रणा , सत्य, धर्म, यज्ञ और प्रकृति के प्रति
वैदि क दृष्टि को ण को वि स्ता र से समझा या जा ता है।
वैदि क चिं तन में प्रकृति केवल मनुष्नुय के उपयो ग की वस्तु नहीं है। सूर्य, अग्नि , वा यु, युजल और पृथ्वी के प्रति व्यक्त
श्रद्धा मनुष्नुय और प्रकृति के बी च एक गहरे संबंध की ओर संकेत करती है। पुस्पुतक इस संबंध को आधुनिधुनिक पर्या वरणी य
संकट के संदर्भ में भी देखने का प्रया स करती है।
इसके बा द पुस्पुतक वैदि क समा ज और मा नव जी वन की ओर बढ़ती है। धर्म, अर्थ, का म और मो क्ष के रूप में मा नव
जी वन के वि भि न्न उद्देश्यों को समझने का प्रया स कि या जा ता है। आश्रम व्यवस्था , परि वा र, सा मा जि क सहयो ग, शि क्षा
और स्त्री की भूमिभूमिका जैसे वि षयों के मा ध्यम से यह देखा जा ता है कि प्रा ची न भा रती य चिं तन में व्यक्ति और समा ज के
संबंध को कि स प्रका र समझा गया ।
पुस्पुतक का केंद्री य मो ड़ उपनि षदों की ओर संक्रमण है।
उपनि षदों में प्रश्न और अधि क गहरा हो जा ता है। यदि संसा र परि वर्तनशी ल है, तो उसके पी छे स्था यी क्या है? शरी र
बदलता है, मन बदलता है, वि चा र बदलते हैं—हैं लेकि न क्या को ई ऐसा तत्व है जो इन सभी परि वर्तनों का सा क्षी है? “मैं कौ न हूँ?”
यहीं से आता है वह महा न प्रश्न—
उपनि षदि क चिं तन में आत्मा की खो ज केवल धा र्मि क वि श्वा स का वि षय नहीं , हीं बल्कि अस्ति त्व की खो ज है। शरी र,
इंद्रि योंद्रियों, मन और बुद्धिबुद्धि से परे आत्मा की अवधा रणा को समझने का प्रया स इस पुस्पुतक के महत्वपूर्ण हि स्सों में से एक है।
इसके सा थ ही पुस्पुतक ब्रह्म की अवधा रणा पर वि चा र करती है—उस परम वा स्तवि कता की खो ज जि से उपनि षद
वि भि न्न प्रका र से व्यक्त करने का प्रया स करते हैं।हैं आत्मा और ब्रह्म के संबंध को समझते हुए “तत्त्वमसि ” और “अहं
ब्रह्मा स्मि ” जैसे महा वा क्यों के दार्शनि क अर्थ की चर्चा की जा ती है।
चा र महा वा क्यों के मा ध्यम से पुस्पुतक यह समझने का प्रया स करती है कि उपनि षदि क चिं तन में व्यक्ति और परम
वा स्तवि कता के बी च संबंध को कि स प्रका र देखा गया है। इसी क्रम में “नेति -नेति ” की पद्धति यह दि खा ती है कि परम
सत्य को कि सी एक सी मि त अवधा रणा में बाँ धना कि तना कठि न है।
पुस्पुतक का एक महत्वपूर्ण भा ग चेतना के प्रश्न को समर्पि त है। जा ग्रत, स्वप्न और सुषुसुप्तिषुप्ति जैसी अवस्था ओं के मा ध्यम
से उपनि षद मनुष्नुय के अनुभनुव-जगत को समझने का प्रया स करते हैं।हैं मा ण्डूक्य उपनि षद और ॐ की अवधा रणा इस
चिं तन को और अधि क गहरा ई प्रदान करती है।
इसी के सा थ मन, बुद्धिबुद्धि, इंद्रि याँद्रियाँ और प्रा ण की अवधा रणा ओं का अध्ययन कि या जा ता है। मनुष्नुय की बा हरी स्वतंत्रता के
सा थ उसकी आंतरि क स्वतंत्रता का प्रश्न भी यहाँ महत्वपूर्ण हो जा ता है। क्या मनुष्नुय अपनी इच्छा ओं, भय, क्रो ध, लो भ
और आसक्ति यों से ऊपर उठ सकता है? क्या आत्मसंयम मनुष्नुय को अधि क स्वतंत्र बना सकता है?
पुस्पुतक में कर्म और कर्मफल की अवधा रणा को भी व्या पक दार्शनि क संदर्भ में समझा या गया है। कर्म केवल कि सी
धा र्मि क अनुष्नुठा न का ना म नहीं , हीं बल्कि मनुष्नुय के का र्य, उद्देश्य, चुनाचुनाव और उनके परि णा मों से जुड़ाजुड़ा प्रश्न है। इसके
सा थ पुनपुर्जन्म और संसा र की अवधा रणा ओं का वि श्लेषण कि या गया है।
कठो पनि षद के नचि केता और यम के संवा द के मा ध्यम से मृत्मृयु के प्रश्न को वि शेष रूप से समझा या गया है। नचि केता
का प्रश्न केवल मृत्मृयु के बा द के जी वन का प्रश्न नहीं है; वह मनुष्नुय के उस सा हस का प्रती क है जो अस्था यी सुखोंसु खों से
आगे बढ़कर अंति म सत्य को जा नना चा हता है।
पुस्पुतक का अगला महत्वपूर्ण वि षय है—आत्मज्ञा न।
अज्ञा न से ज्ञा न की या त्रा केवल अधि क जा नका री प्रा प्त करने की या त्रा नहीं है। यह स्वयं के बा रे में बनी सी मि त
धा रणा ओं की समी क्षा करने की प्रक्रि या है। आत्मज्ञा न का अर्थ अपने वा स्तवि क स्वरूप को समझने की दि शा में बढ़ना
है। इस दृष्टि से वि वेक, आत्मचिं तन, ध्या न और अंतर्मुखर्मु ता महत्वपूर्ण हो जा ते हैं।हैं
त्या ग और वैरा ग्य को भी पुस्पुतक एक संतुलितुलित दृष्टि से समझने का प्रया स करती है। त्या ग का अर्थ संसा र से भा गना
आवश्यक नहीं है। वा स्तवि क प्रश्न आसक्ति का है। मनुष्नुय संसा र में रहते हुए भी अपनी इच्छा ओं और वस्तुओंतु ओंका
दास न बने—यह वि चा र आज के उपभो क्ता वा दी समा ज में वि शेष रूप से प्रा संगि क हो सकता है।
इसी क्रम में ध्या न, मौ न, आत्म-अवलो कन और आंतरि क अनुशानुशासन की चर्चा की जा ती है। ध्या न को केवल कि सी
धा र्मि क पद्धति के रूप में नहीं , हीं बल्कि मनुष्नुय की स्वयं को देखने और समझने की क्षमता के रूप में भी समझने का प्रया स
कि या गया है। पुस्पुतक आनंद और सुखसु के बी च भी अंतर स्था पि त करती है। बा हरी सुखसु परि स्थि ति यों , वस्तुओंतु ओंऔर इच्छा ओं पर
नि र्भर हो सकता है, जबकि उपनि षदि क चिं तन में आनंद को अस्ति त्व के अधि क गहरे आया म से जो ड़ा जा ता है।
तैत्ति री य उपनि षद की आनंद-दृष्टि इस चर्चा को वि शेष गहरा ई प्रदान करती है।
इन सभी वि चा रों की परि णति मो क्ष की अवधा रणा में हो ती है।
मो क्ष को केवल मृत्मृयु के बा द मि लने वा ली कि सी दूरस्थ अवस्था के रूप में देखने के बजा य पुस्पुतक उसे बंधन, अज्ञा न
और आसक्ति से मुक्तिमुक्ति की व्या पक दार्शनि क अवधा रणा के रूप में समझने का प्रया स करती है। प्रश्न यह बन जा ता है
कि मनुष्नुय वर्तमा न जी वन में कि तनी आंतरि क स्वतंत्रता प्रा प्त कर सकता है।
पुस्पुतक के अंति म भा ग में इन प्रा ची न वि चा रों को आधुनिधुनिक संसा र के संदर्भ में देखा गया है। आज मनुष्नुय तकनी की रूप
से अत्यंत शक्ति शा ली है, लेकि न मा नसि क और अस्ति त्वगत स्तर पर अनेक चुनौचुनौति यों का सा मना कर रहा है।
उपभो क्ता वा द, अत्यधि क प्रति स्पर्धा , पर्या वरणी य संकट, सा मा जि क तना व, अकेला पन, नैति क दुविदुविधा एँ और नि रंतर
बढ़ती इच्छा एँ आधुनिधुनिक जी वन को जटि ल बना रही हैं।हैं
ऐसे समय में वेदों और उपनि षदों का अध्ययन अती त में लौ टने का आग्रह नहीं है। यह अपने वर्तमा न को एक अलग
दृष्टि से देखने का अवसर हो सकता है।
इस पुस्पुतक का उद्देश्य यह दावा करना नहीं है कि प्रा ची न ग्रंथग्रं आधुनिधुनिक वि ज्ञा न या आधुनिधुनिक समा ज के प्रत्येक प्रश्न का
प्रत्यक्ष उत्तर देते हैं।हैं बल्कि यह पुस्पुतक उनके वि चा रों को उनके ऐति हा सि क और दार्शनि क संदर्भ में समझते हुए
आधुनिधुनिक जी वन के सा थ उनका संवा द स्था पि त करने का प्रया स करती है।
वि ज्ञा न और दर्शन की अपनी -अपनी पद्धति याँ हैं।हैं इसलि ए पुस्पुतक में जहाँ वैदि क-उपनि षदि क वि चा रों और आधुनिधुनिक
वि ज्ञा न के बी च समा नता ओं की चर्चा हो गी , वहाँ समा नता को वैज्ञा नि क प्रमा ण के रूप में प्रस्तुततु करने से बचते हुए दोनों
क्षेत्रों की प्रकृति और सी मा ओं को स्पष्ट रखने का प्रया स कि या गया है।
इस पुस्पुतक का एक वि शेष उद्देश्य परंपरा और स्वतंत्र चिं तन के बी च संतुलतुन स्था पि त करना है।
परंपरा का सम्मा न आवश्यक है, लेकि न कि सी भी परंपरा को समझने के लि ए प्रश्न करना भी आवश्यक है। उपनि षदों
की संवा द-परंपरा स्वयं इस बा त का उदाहरण प्रस्तुततु करती है। गुरुगु के सा मने शि ष्य प्रश्न करता है, जि ज्ञा सा रखता है,
संदेह व्यक्त करता है और सत्य की खो ज करता है। इसलि ए उपनि षदि क चिं तन को केवल नि ष्क्रि य वि श्वा स की
परंपरा मा नना उसके बौ द्धि क स्वरूप को सी मि त कर देना हो गा ।
यह पुस्पुतक पा ठक से अंधस्वी कृति की अपेक्षा नहीं करती । इसके वि परी त, यह पा ठक को पढ़ने, सो चने, प्रश्न करने
और स्वयं नि ष्कर्ष तक पहुँचने के लि ए आमंत्रिमंत्रित करती है।
43 अध्या यों में वि कसि त यह पुस्पुतक एक क्रमि क या त्रा है। आरंभ में मनुष्नुय ब्रह्मां ड को देखता है। फि र वह प्रकृति और
समा ज को समझता है। इसके बा द वह स्वयं की ओर मुड़मुड़ता है। वह मन, बुद्धिबुद्धि और चेतना को देखने का प्रया स करता
है। फि र आत्मा और ब्रह्म के प्रश्न सा मने आते हैं।हैं कर्म, पुनपुर्जन्म, मृत्मृयु, युज्ञा न, ध्या न और त्या ग की चर्चा हो ती है।
अंततः प्रश्न मुक्तिमुक्ति और स्वतंत्रता तक पहुँचता है।
इस प्रका र पुस्पुतक का केंद्री य संदेश कि सी एक वा क्य में बाँ धना कठि न है, लेकि न इसकी पूरी या त्रा को एक प्रश्न में
संक्षेपि त कि या जा सकता है— मनुष्नुय अपने वा स्तवि क स्वरूप को जा नकर कि तना स्वतंत्र हो सकता है?
यही प्रश्न वेदों और उपनि षदों की शि क्षा ओं को आज भी जी वंत बना ता है।
यह पुस्पुतक उन पा ठकों के लि ए है जो भा रती य दर्शन को सरल लेकि न गंभीगं भीर भा षा में समझना चा हते हैं; हैं उन वि द्या र्थि यों
के लि ए जो वेद और उपनि षदों के मूलमू वि चा रों से परि चि त हो ना चा हते हैं; हैं उन पा ठकों के लि ए जो धर्म और दर्शन के
बी च संबंध को समझना चा हते हैं; हैं और उन जि ज्ञा सु मनुष्नुयों के लि ए जो जी वन, चेतना और अस्ति त्व के मूलमू प्रश्नों पर
वि चा र करना चा हते हैं।हैं
अंततः यह पुस्पुतक केवल वेदों और उपनि षदों के बा रे में नहीं है।
यह मनुष्नुय की अपनी खो ज के बा रे में है।

About the Author

रुपेश रंजन एक लेखक, चिंतक और स्वतंत्र वि चा रक हैं, हैं जि नकी लेखनी भा रती य समा ज, दर्शन, इति हा स, संवि धा न,
संस्कृति , धर्म, रा जनी ति , प्रशा सन, शि क्षा , मा नव जी वन और समका ली न वि श्व से जुड़ेजुड़े वि वि ध वि षयों पर केंद्रि तद्रि रही है।
उनकी लेखन-दृष्टि का मूलमू उद्देश्य जटि ल वि षयों को व्या पक संदर्भ, सरल भा षा और स्वतंत्र चिं तन के मा ध्यम से
पा ठकों के सा मने प्रस्तुततु करना है।
उनका सा हि त्यि क का र्यक्षेत्र कि सी एक वि षय या वि धा तक सी मि त नहीं है। वे भा रती य सभ्यता और संस्कृति के मूलमू
प्रश्नों से लेकर आधुनिधुनिक रा ष्ट्र-ष्ट्रनि र्मा ण, लो कतंत्र, संवैधा नि क मूल्मूयों , सा मा जि क परि वर्तन, शि क्षा , प्रशा सन, वि ज्ञा न,
अर्थव्यवस्था और मा नव वि का स जैसे वि षयों तक अपनी लेखकी य रुचि का वि स्ता र करते हैं।हैं उनके लि ए लेखन केवल
जा नका री प्रस्तुततु करने का मा ध्यम नहीं , हीं बल्कि प्रश्न उठा ने, वि चा र करने और समा ज को स्वयं के बा रे में पुनपुर्वि चा र
करने के लि ए प्रेरि त करने का मा ध्यम है।
भा रती य ज्ञा न-परंपरा के प्रति उनकी वि शेष रुचि ने उन्हें वेदों, उपनि षदों, भगवद्गी ता , भा रती य दर्शन और सना तन
चिं तन के मूलमू प्रश्नों की ओर आकर्षि त कि या । “वेदों और उपनि षदों की शि क्षा एँ”एँ इसी बौ द्धि क और दार्शनि क या त्रा का
परि णा म है। इस पुस्पुतक के मा ध्यम से लेखक ने प्रा ची न भा रती य चिं तन को केवल धा र्मि क ग्रंथोंग्रं थों के रूप में देखने के
बजा य एक व्या पक दार्शनि क परंपरा के रूप में समझने का प्रया स कि या है—एक ऐसी परंपरा जो मनुष्नुय, प्रकृति , चेतना ,
आत्मा , ब्रह्म, सत्य, कर्म, ज्ञा न और मुक्तिमुक्ति जैसे प्रश्नों पर गंभीगं भीर संवा द करती है।
रुपेश रंजन की लेखकी य दृष्टि में भा रती य परंपरा और आधुनिधुनिकता एक-दूसरे के वि रो धी नहीं हैं।हैं वे मा नते हैं कि
प्रा ची न ज्ञा न का मूल्मूय तभी अधि क सा र्थक हो सकता है जब उसे वर्तमा न समय के प्रश्नों के सा थ संवा द में रखा जा ए।
इसी का रण उनके लेखन में परंपरा के प्रति सम्मा न के सा थ-सा थ तर्क, वि वेक, स्वतंत्र चिं तन और आधुनिधुनिक दृष्टि को
भी महत्व दि या जा ता है।
उनकी रुचि वि शेष रूप से उन प्रश्नों में है जो मनुष्नुय और समा ज के भवि ष्य से जुड़ेजुड़े हैं—हैं मनुष्नुय बेहतर समा ज कैसे बना ए,
ज्ञा न का उद्देश्य क्या हो , शि क्षा व्यक्ति और रा ष्ट्र को कैसे बदल सकती है, संस्था एँ अधि क उत्तरदायी कैसे बन सकती
हैं, हैं और आधुनिधुनिक वि का स के बी च मा नवी य मूल्मूयों को कि स प्रका र सुरसुक्षि त रखा जा सकता है।
लेखन के अति रि क्त उनका शैक्षि क और प्रशा सनि क अनुभनुव भी उनकी दृष्टि को प्रभा वि त करता है। तकनी की शि क्षा
और प्रबंधन की पृष्ठभूमिभूमि के सा थ सा र्वजनि क प्रशा सन और शा सन-व्यवस्था से उनका जुड़ाजुड़ा व उन्हें समा ज को केवल
सैद्धां ति क दृष्टि से नहीं , हीं बल्कि व्या वहा रि क धरा तल पर देखने का अवसर देता है। इसी का रण उनके लेखन में वि चा र
और व्यवहा र, दर्शन और समा ज, व्यक्ति और व्यवस्था तथा अती त और भवि ष्य के बी च संबंध स्था पि त करने का प्रया स
दि खा ई देता है।
उनकी लेखकी य या त्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष वि षय-वि वि धता है। भा रती य संवि धा न और सर्वो च्च न्या या लय के
ऐति हा सि क नि र्णयों से लेकर महा भा रत, हिं दूधर्म, वेद-उपनि षद, गां धी और सुभासुभाषचंद्र बो स, भा रती य प्रशा सनि क लेखक का सा हि त्यि क दृष्टि को ण
व्यवस्था , भा रत का वि का स, शि क्षा , युवायुवा पी ढ़ी , वि ज्ञा न और सा मा जि क प्रश्नों तक अनेक वि षय उनके लेखन का हि स्सा
रहे हैं।हैं
उनके लि ए सा हि त्य का अर्थ केवल मनो रंजन नहीं , हीं बल्कि चिं तन का वि स्ता र भी है। वे मा नते हैं कि एक अच्छी पुस्पुतक
पा ठक को केवल उत्तर नहीं देती ; वह ऐसे प्रश्न भी छो ड़ जा ती है जि न पर पा ठक पुस्पुतक बंद करने के बा द भी वि चा र
करता रहे।
“वेदों और उपनि षदों की शि क्षा एँ”एँ में यही दृष्टि को ण वि शेष रूप से दि खा ई देता है। पुस्पुतक का केंद्री य प्रश्न केवल यह
नहीं है कि वेदों और उपनि षदों ने क्या कहा , बल्कि यह भी है कि उनके वि चा रों को आज का मनुष्नुय कि स प्रका र समझ
सकता है। सत्य, धर्म, यज्ञ, आत्मा , ब्रह्म, कर्म, ध्या न, त्या ग, आनंद और मो क्ष जैसे वि षयों को लेखक ने मा नव जी वन
के व्या पक प्रश्नों से जो ड़ने का प्रया स कि या है।
रुपेश रंजन की लेखनी का एक प्रमुखमु वि श्वा स है कि ज्ञा न तभी सा र्थक है जब वह मनुष्नुय को अधि क जा गरूक, अधि क
स्वतंत्र और अधि क मा नवी य बना ए। उनके लि ए भा रती य दर्शन कि सी बी ते हुए युगयु की स्मृतिमृति मा त्र नहीं , हीं बल्कि नि रंतर
चलने वा ला संवा द है—मनुष्नुय और प्रकृति के बी च, व्यक्ति और समा ज के बी च, भौ ति क जी वन और आध्या त्मि क प्रश्नों
के बी च तथा बा हरी संसा र और मनुष्नुय के अंतर्मन के बी च।
वे पा ठकों को कि सी वि चा र को केवल इसलि ए स्वी का र करने के लि ए प्रेरि त नहीं करते कि वह प्रा ची न है। इसके
वि परी त, उनका प्रया स है कि पा ठक परंपरा को समझे, प्रश्न करे, वि चा र करे और अपने वि वेक से उसके अर्थ को ग्रहण
करे। यही स्वतंत्र चिं तन उनकी लेखकी य पहचा न का महत्वपूर्ण आधा र है।
उनका वि श्वा स है कि मनुष्नुय की वा स्तवि क प्रगति केवल तकनी की या आर्थि क वि का स में नहीं , हीं बल्कि ज्ञा न, नैति कता ,
संवेदनशी लता , आत्मबो ध और सा मा जि क उत्तरदायि त्व के वि का स में भी नि हि त है।
इसी वि श्वा स के सा थ उनकी लेखकी य या त्रा नि रंतर आगे बढ़ रही है—अती त को समझने, वर्तमा न को देखने और
भवि ष्य की संभा वना ओं पर वि चा र करने की दि शा में।में
“ज्ञा न का उद्देश्य केवल यह जा नना नहीं कि संसा र क्या है; ज्ञा न का एक गहरा उद्देश्य यह समझना भी है कि
हम स्वयं कौ न हैं और हमें कि स प्रका र का जी वन जी ना चा हि ए।”
रुपेश रंजन का लेखन इसी प्रश्न से प्रेरि त है—मनुष्नुय स्वयं को , अपने समा ज को और अपने समय को बेहतर ढंग से
कैसे समझ सकता है।
उनकी दृष्टि में लेखन एक नि रंतर या त्रा है—प्रश्न से वि चा र तक, वि चा र से ज्ञा न तक और ज्ञा न से आत्मबो ध तक।

Book Details

Number of Pages: 561
Availability: Available for Download (e-book)

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