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लकवाग्रस्त लोकतंत्र
एक युद्ध राजनीति के विरुद्ध
क्या भारतीय लोकतंत्र वास्तव में जनता का शासन है, या फिर यह सत्ता, धन, जाति, प्रचार और राजनीतिक स्वार्थों के बोझ तले धीरे-धीरे कमजोर हो चुका है?
"लकवाग्रस्त लोकतंत्र" भारतीय राजनीति की जटिलताओं, विरोधाभासों और कमजोरियों पर आधारित एक विचारोत्तेजक पुस्तक है। यह पुस्तक लोकतंत्र के उन पहलुओं को उजागर करने का प्रयास करती है जिन पर सामान्यतः खुलकर चर्चा नहीं होती। चुनावी चंदा, राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली, अवसरवादी राजनीति, संसद और राज्यसभा की प्रासंगिकता, मीडिया की भूमिका, भ्रष्टाचार, जनता की निष्क्रियता और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे विषयों पर लेखक ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
लेखक सत्याम पाठक ने इस पुस्तक में केवल आलोचना नहीं की, बल्कि यह समझने का प्रयास भी किया है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता में निहित होने के बावजूद व्यवस्था आम नागरिक से क्यों दूर होती जा रही है। यह पुस्तक पाठकों को सोचने, प्रश्न करने और लोकतंत्र को केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो भारतीय राजनीति को गहराई से समझना चाहते हैं, लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चिंतन करना चाहते हैं तथा व्यवस्था की कमियों और संभावित सुधारों पर विचार करना चाहते हैं।
"लकवाग्रस्त लोकतंत्र" किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करती, बल्कि प्रश्न पूछने का साहस देती है। यह पुस्तक संवाद, विचार और जागरूक नागरिकता के महत्व को रेखांकित करती है।
यदि आप राजनीति को केवल समाचारों तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसके पीछे छिपे प्रभावों और वास्तविकताओं को समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है।
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