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डिजिटल मुखौटा: पहचान का धोखा। कौन है वह स्क्रीन के उस पार?
प्रस्तावना: स्क्रीन के उस पार का सच
सुबह की पहली किरण के साथ ही हमारे हाथों में मोबाइल आ जाता है। उठते ही व्हाट्सएप के मैसेज चेक करना, फेसबुक की न्यूज फीड स्क्रॉल करना और इंस्टाग्राम की रील्स देखना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। हमें ऐसा लगता है कि हम इस वर्चुअल दुनिया से जुड़कर बहुत आगे निकल आए हैं, अपनों के करीब हो गए हैं और दुनिया भर की जानकारी हमारी मुट्ठी में है। लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि जिस स्क्रीन को आप अपनी उंगलियों से छू रहे हैं, उस कांच के पार की दुनिया असल में है कैसी? क्या वहां सब कुछ वैसा ही साफ-सुथरा और सच है जैसा यह दिखाई देता है?
यही वह सवाल है जो आज के दौर के सबसे बड़े और खतरनाक सच को हमारे सामने लाता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हमारी जिंदगी को जितना आसान बनाया है, उतना ही इसे असुरक्षित भी कर दिया है। आज के समय में कोई भी व्यक्ति अपने असली चेहरे को छुपाकर एक नया, झूठा और आकर्षक अवतार गढ़ सकता है। एक फर्जी नाम, किसी खूबसूरत तस्वीर और मीठे शब्दों के सहारे वह रातों-रात किसी की भी जिंदगी में दाखिल हो सकता है। यह तकनीक का वह काला पहलू है जहां विश्वास सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है।
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