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हम जीते कम हैं, मानते ज़्यादा हैं।
हम देखते कम हैं, निष्कर्ष पहले बना लेते हैं।
पर अगर सच हमारी मान्यताओं से बड़ा हो तो?
अनंत अनलर्निंग: विश्वासों की सीमाओं से परे जागता मन उस क्षण से जन्म लेती है जब इंसान पहली बार अपने ही विचारों पर संदेह करता है। यह किताब आपको नई धारणाएँ देने नहीं आई — यह आपको उन धारणाओं से मुक्त करने आई है जो अनजाने में आपकी दुनिया को सीमित कर रही हैं।
हमारा मन बचपन से आकार लेता है — परिवार, शिक्षा, समाज, परंपरा… हर आवाज़ हमें बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है, क्या संभव है, क्या असंभव। धीरे-धीरे हम उन आवाज़ों को अपना स्वर समझने लगते हैं।
यह पुस्तक उसी भ्रम को धीरे-धीरे उजागर करती है।
नौ गहन अध्यायों की यह यात्रा आपको भीतर की उस जगह तक ले जाती है जहाँ विचार शांत हो जाते हैं और देखना शुरू होता है। जहाँ पहचानें ढहती हैं और एक सरल, निर्मल जागरूकता जन्म लेती है।
यह किताब उत्तरों का संग्रह नहीं है।
यह प्रश्नों की अग्नि है।
यह आपको चुनौती देती है —
क्या आप अपने सबसे प्रिय विश्वासों को भी देखने के लिए तैयार हैं?
क्या आप निश्चितताओं की सुरक्षा छोड़कर अनंत की ओर कदम बढ़ा सकते हैं?
अनंत अनलर्निंग उन लोगों के लिए है जो भीड़ में रहकर भी भीतर से अलग महसूस करते हैं।
उनके लिए जो जानना नहीं, समझना चाहते हैं।
उनके लिए जो सुनना नहीं, देखना चाहते हैं।
क्योंकि जब विश्वास गिरते हैं —
तभी मन सच में जागता है।
और वही जागरण, स्वतंत्रता की पहली सांस है।
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