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कुछ जज़्बात कहे नहीं जाते, सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं।
"उम्र-ए-क़ैद: जज़्बातों की तहरीर" उन अनकहे एहसासों का संग्रह है, जो कभी मोहब्बत बनकर धड़कते हैं, कभी तन्हाई बनकर रुलाते हैं और कभी उम्मीद बनकर जीने की वजह देते हैं।
इस पुस्तक की हर शायरी किसी कहानी का अधूरा पन्ना है—कहीं इश्क़ की मासूमियत, कहीं बिछड़ने का दर्द, कहीं इंतज़ार की बेचैनी, तो कहीं ख़ुद को तलाशने की जद्दोजहद।
यह किताब केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए लिखी गई है। हो सकता है इन अल्फ़ाज़ में आपको अपनी ही कहानी, अपने ही जज़्बात और अपनी ही ख़ामोशियाँ मिल जाएँ।
हर शायरी एक कहानी है…
हर कहानी एक एहसास…
और हर एहसास, उम्र-ए-क़ैद।
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