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"वो मुझे छोड़ के नहीं गई। वो उस लड़के को छोड़ के गई जो मैं उसके साथ बन गया था। और सच बताऊँ? मुझे भी वो लड़का पसंद नहीं था।"
चार साल। दो शहर। एक फ़ोन कॉल — ग्यारह मिनट, बयालीस सेकंड।
कार्तिक शर्मा चौबीस साल का है, Bengaluru में code लिखता है, और उसका alarm अभी भी रोज़ सुबह 7:40 पे बजता है — "Meher uth ja" — छह महीने बाद भी।
ये उन दो सालों की कहानी है।
रात के 4:17 वाली छत। अड़तीस बार खुला हुआ WhatsApp। वो message जो नहीं भेजना चाहिए था और भेज दिया। वो लड़की जिसे उसने चोट पहुँचाई क्योंकि वो ख़ुद टूटा हुआ था। एक माँ जिसने सत्तर बार पूछा था। एक दोस्त जो पूरी रात फ़ोन पे सोया रहा। और एक पिता जिसने इकतीस शब्दों में वो कह दिया जो बीस हज़ार रुपये की therapy नहीं कह पाई।
कोई पाँच steps नहीं। कोई "वो तेरे लायक़ नहीं थी" नहीं। कोई transformation montage नहीं।
बस एक लड़का, एक टूटा हुआ रिश्ता, और वो सच्चाई जो हर किसी को देर से समझ आती है — कि जिसके बिना तुम दो साल जी गए, वो तुम्हारी ज़रूरत कभी थी ही नहीं।
अगर तुमने कभी किसी का chat archive किया है, delete नहीं — ये किताब तुम्हारे लिए है।
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