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कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में आते नहीं… उतर जाते हैं।
धीरे-धीरे, आदत बनकर।
और फिर एक दिन वही लोग हमारी सबसे बड़ी ख़ामोशी बन जाते हैं।
यह कहानी है आरव की—
एक ऐसे लेखक की, जिसने शब्दों में पूरी दुनिया को मोहब्बत सिखाई,
लेकिन अपनी ही मोहब्बत को बचा नहीं पाया।
और यह कहानी है सिया की—
जो उसके टूटे हुए हिस्सों को जोड़ते-जोड़ते,
खुद उसकी सबसे गहरी कमी बन गई।
कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर याद नहीं रहते,
अधूरे रहकर अमर हो जाते हैं।
“मैं वहीं हूँ”
सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं,
बल्कि उन लोगों की दास्तान है जो किसी को भूल नहीं पाते—
चाहे वक़्त कितना भी गुज़र जाए।
अगर आपने कभी किसी को इतना चाहा है
कि उसके जाने के बाद भी वह आपके भीतर ज़िंदा रहा हो…
तो शायद यह किताब आपको आपकी अपनी कहानी लगे।
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