You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
"वहाँ कोई सवाल नहीं पूछता सुहाना। वहाँ कोई ये नहीं देखता कि तुम्हारे पास कौन सी गाड़ी है, तुम्हारी सैलरी का स्लैब क्या है, या तुम किस पद पर बैठे हो। जब आप किसी अनजान मोड़ पर खड़े होते हैं ना, तो पहाड़ आपकी हैसियत नहीं, आपकी रूह का वज़न नापते हैं। शहर में हम जो मुखौटे पहनकर घूमते हैं, वो पहली ही ठंडी हवा के झोंके में उड़ जाते हैं। वहाँ सिर्फ तुम बचते हो... बिल्कुल साफ़, बिल्कुल सच।"
हम सब अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा उन चीज़ों को कमाने में गँवा देते हैं, जो कभी हमारी थीं ही नहीं—सैलरी स्लिप्स पर छपे बेजान अंक, काँच के केबिनों में टँगी झूठी मुसकानें और वो खोखली पहचान जिसे हम अपना नाम समझ बैठे हैं। आठवें फ़्लोर की एयर-कंडीशंड ठंडक में साँसें तो चलती हैं, पर दिल कब का धड़कना भूल चुका होता है।
यह दास्तान सिर्फ़ कबीर, सुहाना और मीरा की नहीं है; यह उस दबे हुए सवाल की गूँज है जो हर रोज़ आपके भीतर भी चीखता है—क्या आप सच में जी रहे हैं, या सिर्फ़ तारीखें बदल रहे हैं?
अगर कभी किसी शहर के ट्रैफ़िक में फँसकर, अपनी उँगलियों को स्टीयरिंग पर भींचते हुए आपने दूर धुंध में किसी पहाड़ को याद किया है... अगर कभी किसी भरी महफ़िल में भी खुद को बेहद तन्हा पाया है... तो यह किताब आपके उसी अनकहे दर्द का आईना है।
पन्ने पलटिए, क्योंकि यह किसी कहानी की शुरुआत नहीं, उस पिंजरे को तोड़कर अपनी रूह को वापस पाने की पहली परवाज़ है।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book सफ़र ही सिला है.